लघुकथा : घर का ना घाट का – डा. मधु आंधीवाल अलीगढ़

लघुकथा

घर का ना घाट का

गांव के जमींदार का बेटा अमर अनपढ़ उसके लिये काला अक्षर भैंस बराबर था । उस पर सबसे बुरी आदत थी हर समय गाल बजाना । पिता यदि कुछ कहते तो गाल फुला कर कोप भवन में चला जाता फिर भी दादी का प्राण प्रिय था ।
दादी और पिता ने निर्णय लिया कि किसी तरह इसकी शादी करके इसे खूंटे से बांध दिया जाये जमींदार साहब कन्या की तलाश करने लगे । कुछ मां बाप अमर की मोटी बुद्धि के कारण अपनी बेटी को उसके पल्ले नहीं बाधना चाहते थे ।अब जमींदार साहब ने सोचा किसी गरीब घर की कन्या को तलाशे । रूपा के मां बाप बहुत गरीब थे रूपा नाम के अनुरुप रुप सुन्दरी थी गांव के लड़के उसे छप्पन छुरी कहते थे । अमर को तो वह ऐसी मन भाई की अड़ियल टट्टू की तरह अड़ गया कि शादी करेगा तो रूपा से ।
जमींदार की स्थिती ऐसी थी मरता क्या ना करता और रूपा के बाप की खुशामद करके उल्टा रु देकर चट मंगनी पट शादी कर दी । रूपा अपने भाग्य पर इठला रही थी एक तो इतना मालदार घर उस पर पति निठल्ला मूढ़ बुद्धि । रूपा ने अमर के गले में अपने रुप जाल का फन्दा कस दिया । वह तो जोरू का गुलाम होगया । कुछ दिन सब सही चला और एक दिन रूपा दादी सास ,सास ,ससुर और अमर की आंखो में धूल झौक कर अपने प्रेमी के साथ नौ दो गयारह हो गयी । जमींदार साहब सर पर हाथ रख कर बैठे थे क्योंकि चिड़िया चुग गयी खेत । अमर की स्थिती ऎसी थी ना धोबी घर का था ना घाट का ।

डा. मधु आंधीवाल
अलीगढ़