वैचारिक चिंतन :-परिस्थिति – उषा सक्सेना भोपाल

80

वैचारिक चिंतन :-परिस्थिति

कहते हैं कि -मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है परंतु हर जगह बंधनों में बंधा है ।यह बंधन उसके जन्म के साथ ही प्रारब्ध का निर्माण करते हुये प्रारंभ होजाते हैं ।जाति धर्म ,माता पिता ,परिवार समाज । इस सबके बीच पल कर ही उसके चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण होता है ।अत:स ज ही कहा जा सकता है कि जैसी परिस्थितियां होंगी वैसा ही तो मनुष्य होगा । अपने जन्म के साथ न वह कुछ लेकर आता है और ना ही साथ में लेकर जाता है। जो कुछ भी है वह यही कमाता और गंवा कर चला जाता है । इसीलिये मनुष्य को परिस्थितियों का दास कहा जाता है ,किंतु यह पूर्ण रुपेण सच नही । यह संसार कर्म प्रधान है और मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा परिस्थितियों का स्वयं निर्मात बन सकता है ।परिस्थितियां अच्छी हों तो सभी अपने आप ही अच्छे होंगे किंतु विपरीत होने पर धारा के प्रतिकूल बह कर भी मानव अपने उद्यम और साहस से दृढ़ संकल्प शक्ति द्वारा उसे बदल सकता है । अपने पौरुषेय पौरुष के बल पर वह विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बना कर संसार को दिखा देता है कि वह परिस्थितियों का दास नही वरन् परिस्थितियों का स्वयं निर्माता है ।ऐसे ही व्यक्ति संसार में महान् होतेहै अपने भाग्य के स्वयं निर्माता बनकर ।

उषा सक्सेना
भोपाल

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here