काव्य : ग़ज़ल – भाऊराव महंत बालाघाट

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ग़ज़ल

छोटे-छोटे काम गिना कर ख़ुश हैं हम।
साहिल पर ही पाँव डुबा कर ख़ुश हैं हम।

जिन फूलों से रंग-ओ-बू मिलती हमको,
काँटें उनको रोज़ चुभा कर ख़ुश हैं हम।

ख़ैरख़्वाही छोड़ी हमने ग़ैरों की,
बेशक़ अपनी दाल गला कर ख़ुश हैं हम।

जिनकी तलवारें हैं अपनी गर्दन पर,
उनको ही भगवान बना कर ख़ुश हैं हम।

बेच दिया है हमने मन का आभूषण,
नश्वर तन को ख़ूब सजा कर ख़ुश हैं हम।

मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारों में,
सब धर्मों में भेद बता कर ख़ुश हैं हम।

चार क़िताबें क्या पढ़ ली हमने यारो,
ख़ुद को अफ़लातून जता कर ख़ुश हैं हम।

भाऊराव महंत
बालाघाट

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