काव्य : प्रकृति – बिन्दु त्रिपाठी ,छतरपुरा, सीहोर

प्रकृति

परित्याग करो अपनी,
इस मानसिक विकृति का।
कहाँ खोजते हो सुकून,
मेरे पास आओ, और देखो,
कमाल प्रकृति का।
मेरी हरियाली से हरा रंग ले लो,
मेरी धानी चूनर का धानी रंग ले लो।
पीत हो चले पीत पर्णों से,
पीला रंग ले लो,
और बन जाओ, खुद एक रचनाकार।
गढ़ दो इन रंगों से, एक और प्रकृति को,
फिर देखो, महसूस करो,सुकून को।
मुझे पता है, आज सबसे ज्यादा जरूरत है,
तुम्हे सुकून की।
तो आओ, मेरी गोद में ही तो है वह सुकून।
पर तुम क्या जानो,
तुम तो मेरा ही ऑंचल छीनते हो।
वृक्ष और घनेरे जंगल,
मेरे आभरण हैं,मेरा परिधान हैं।
मेरी हरियाली, खुशहाली का पर्याय है।
पर तुम समझो, तब न!
तुम तो मेरा ही कलेजा छलनी करते हो,
मेरे सीने पर आरी चला कर।
मेरा ही आवरण छीन लेते हो,
और फिर पाखंड करते फिरते हो-
“हरियाली बचाओ,जंगल बचाओ”,
पहले खुद तो एक कदम चलो-
प्रकृति की ओर,
फिर देखो,प्रकृति की गोद में तुम,
कितना फलोगे और, फूलोगे भी।

बिन्दु त्रिपाठी
प्राचार्य
शासकीय हाई स्कूल छतरपुरा
जिला सीहोर