बाल कहानी : प्यारी रेशमी -शमा परवीन बहराइच (उत्तर प्रदेश)

67

बाल कहानी

प्यारी रेशमी

“तिप्ती, रेशमी, माश और नवीन चारों घनिष्ठ मित्र थे। एक ही कक्षा में साथ-साथ पढ़ाई करते थे। विद्यालय में आना-जाना भी साथ था।
एक दिन की बात है। अचानक सब कुछ बदल गया।

शिक्षक-, “रेशमी! ये खेल का समय है। आज तुम अकेली यहाँ बैठी हो और तुम रो क्यूँ रही हो? तुम्हारे सारे मित्र तो खुशी-खुशी खेल रहे है। क्या बात है बेटा?.. मुझे बताओ, आखिर हुआ क्या है?”
रेशमी-, “कुछ नहीं मैमजी! बस, आज मन नहीं है।”
शिक्षक-“अच्छा तो ये बात है। आज खेल खेलने का मन नहीं है,
फिर रो क्यूँ रही हो? बहादुर बच्चे रोते नहीं हैं।”
रेशमी-, “मैमजी! नवीन ने मेरे सारे नोट्स ले लिए बेवकूफ बना के और काम निकलते ही मेरे सभी मित्र बदल गये।”
शिक्षक-, “पर नवीन तो बहुत अच्छा मित्र है तुम्हारा.. फिर तुम्हारे नोट्स वापस क्यूँ नहीं किये और तुमने शिकायत क्यों नहीं की हमसे?”
रेशमी-, “कैसें शिकायत करते मैम! नोट्स जबर्दस्ती लिए नहीं गये है। मैंने खुद बनाके दिये हैं, वो भी सारे विषय के। गलती तो मेरी है मैं नवीन के इमोशनल ड्रामे को सच समझ बैठी। याद है मुझे आज भी। नवीन का काम पूरा नहीं था। उसने कहा-, “तुम मेरा सारा काम कर दो, मेरी तबियत ठीक नहीं हैं। तुम मेरी मित्र और छोटी बहन हो। मेरी सारी नोट्स बुक खो गयी है। कुछ दिन बाद ही नोट्स बुक चेक होगी। तिप्ती और माश भी थे उस समय, जब बात हो रही थी। फिर उसके बाद मैने दिन-रात एक करके नवीन को नोट्स बना के दिये। जैसे ही नोट्स बना के दिये, अगले ही दिन से सब लोग बदल गये है और सब लोग मेरी हँसी उड़ा रहे हैं कि मेरा नाम रेशमी नहीं इमोशनल भावना होना चाहिये। फिर हम चुपचाप खुद ही अलग हो गये।”

शिक्षक-“अच्छा, तो ये बात है! मैं अभी डांटती हूँ उसे।”

रेशमी-, “नहीं मैम! रहने दीजिए क्योकि मुझे लग रहा है कि गलती सिर्फ़ उन लोगों की नहीं है। इसमें गलती मेरी भी है क्योकि कोई भी हमें बेवकूफ कैसे बना सकता है, जबकि सारे मित्र थे। अगर हम समझदारी से काम लिये होते तो आज मित्रता भी बनी रहती और हम छल का शिकार भी नहीं होते।इनको मैने ईश्वर के हवाले कर दिया है, अब वही इंसाफ करेंगे।”
शिक्षक-“तुम तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करती हो, ये सब किसने सिखाया?”
रेशमी-, “मेरी नानी हमेशा कहती है कि हमें सबकी मदद करनी चाहिए, पर अगर मदद के बदले छल मिले तो बदला लेने के बजाय फैसला ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।”
शिक्षक-, “अब आप क्या करेंगी, ऐसे ही अकेले बैठ कर रोयेंगी?”
रेशमी-,”नहीं मैम! अब हम जा रहे है खेलने। तकलीफ है ये अलग बात है, पर मतलबपरस्त मित्रों का साथ छूट गया, ये और भी अच्छी बात है। हमें हर हाल में खुश रहना चाहिये, ये आपने सिखाया है। आप अच्छी मैम हो। अब मैं जा रही हूँ खेलने नये मित्रों के साथ। अब हम हमेशा इस बात का ख्याल रखेंगे कि मैं रेशमी से कभी इमोशनल भावना या बेवकूफ ना कहीं जाऊँ।”

शिक्षा
हमें हमेशा परस्पर सहयोग की भावना रखकर एक-दूसरे का उपकार मानना चाहिए।

शमा परवीन
बहराइच (उत्तर प्रदेश)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here