काव्य : हरी चुनरीया – अनुपमा पटवारी “ख्याति” इंदौर

हरी चुनरीया

प्रकृति की हरी चुनरिया, सबके मन को भाये।
गाढ़ा हरा रंग देख-देख, दिल झूम-झूम जाये।।

रंग – बिरंगे पुष्पों से सजी, धरा अनुपम है।
देख इसका अद्भूत नज़ारा, मन प्रफुल्लित है।।

मीठा नीर बहता नदियों में, कल-कल करते झरने।
जहाँ से गुजरते जीवन देते, पोखर, नदी और झरने।।

परमात्मा का रूप विराट, प्रकृति विशाल है।
मिटाती दुःख दरिद्रता, प्रकृति देदीप्यमान है।।

पेड़- पौधे बनकर, प्रकृति ने जंगल सजाये हैं।
खट्टे-मीठे फलों से, सबको रसास्वादन करवाया है।।

अनुपमा पटवारी “ख्याति”
इंदौर, मध्यप्रदेश