काव्य : अधरें मगर मुस्का रहीं – आर्यावर्ती सरोज “आर्या” लखनऊ

अधरें मगर मुस्का रहीं

दरख्तों से निकली आह
जब -जब वो तोड़े मरोड़े गये,
दृष्टिगोचर ना हुए,पर
बूंद -बूंद शोणित बहे ,
परहित अर्पित किया
सर्वस्व,किन्तु;
तीक्ष्ण आरी अंक में
बेधित हुआ दुर्भाग्य बस,
चाहना इतनी रही
फल- फूल और छाया दूं मैं!
प्रार्थना इतनी रही
श्रृंगारिका, वसुधा बनूं,
खोह में मेरी गिलहरी
और गौरैय्या पली,
भूल कर मुस्कान भोली
भी नहीं लागी भली,
वेदना के दंश सहकर
हरीतिमा बिखरा रही,
दर्द सीने में छुपा,
अधरें मगर मुस्का रहीं

आर्यावर्ती सरोज “आर्या”
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)