काव्य : वृद्धजन दिवस : ये बरगद की छाँव घनेरी – ममता श्रवण अग्रवाल सतना

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ये बरगद की छाँव घनेरी

ये बरगद की छांव घनेरी,
इनको मत तरसाओ अब।
देकर छाया अपनेपन की,
न जाने खो जायेंगे कब।।

बड़े बुजुर्ग आज हमारे ,
सहते दंश एकाकी पन का।
कौन भरे अब इनके घाव,
जब रिक्त हुआ है कोना मन का।

याद करो वो पल तुम अपने,
जब इनने वारा था संसार।
और आज जब ये हुए अशक्त,
तुमने मुँह फेर बदला व्यवहार।।

समय बदलता पर रीति न बदले,
तुम पर भी जब आये ये दिन।
तब सोचो तुम पर क्या बीतेगी,
कैसे जी पाओगे अपनों बिन।।

आज साथ का मोल न जानो
पर जब बिछड़ ये जायेंगे ।
और कभी जब व्यथित रहोगे,
तब याद बहुत ये आएंगे।।

साथ न जायेगी धन दौलत,
साथ जायेगा बस अपनापन।
अतः आज अपना लो इनको,
यही तो हैं अब सच्चा धन।।

ममता श्रवण अग्रवाल
सतना

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