काव्य : यह स्वयं ही शक्ति का अवतार है – संतोष सोनी भोपाल

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यह स्वयं ही शक्ति का अवतार है

पांखुरी पर घोर अत्याचार है ।
तोड़ने का कब किसे अधिकार है ।।

क्या तुम्हें अब तक समझ आई नहीं ,
एक जो यह कोमली मनुहार है ।।

सिर्फ छल का एक जो व्यापार है ,
तुम इसे कहते रहे यह प्यार है ।।

प्यार का ही कत्ल तुमने कर दिया ,
सारी धरती का तुम्हें धिक्कार है ।।

शब्द श्रद्धा कोष में क्यों लिख रखा ,
किसलिए नारी हुई बलिहार है ।।

चेतना अब मर चुकी है मनुज की ,
एक पशु से भी गिरा आचार है ।।

हर अंधेरे और काले हाथ का ,
आज जन-जन ने किया प्रतिकार है ।।

अश्रु का संहार ही संहार है ,
अब न जग में कोई उपसंहार है ।।

संस्कारों की फसल फिर से उगे ,
अब धरा पर घोर पापाचार है ।।

एक बेटी ,बहन ,मां , मौसी ,बुआ ,
एक नारी का बृहद संसार है ।।

तुम न समझो , एक अबला ही इसे ,
यह ,स्वयं ही शक्ति का अवतार है ।।

संतोष सोनी
भोपाल

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