लघुकथा : परवरिश – कुन्ना चौधरी जयपुर

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परवरिश

रोज़ की तरह आज फिर मीरा परेशानी में गलियारे के चक्कर काट रही थी , चिन्तित हो भी क्यों ना रमा बेटी रात दस बजे तक काम से नहीं लौटी ….
बड़बड़ाती हुई मीरा ने आख़िर फ़ोन मिला ही दिया ! जानती थी रमा को बिलकुल पसंद नहीं था उसका फ़ोन करना ,पर माँ की ममता को कब कोई बात समझ आती है….
फ़ोन तो उठाया नहीं रमा ने पर साढ़े दस बजे दरवाज़े से अंदर आते ही बरस पड़ी …”मम्मी ये क्या है चैन से क्यों नहीं रहने देती ! अब बच्ची नहीं हूँ पच्चीस साल की हो गई , आप आज भी इतनी दख़लंदाज़ी क्यों करते हो !सच मुझे बहुत ख़राब लगता है “और सीधी कमरे में चली गई !
दरवाज़े का सहारा लिए खड़ी मीरा कुछ बोल ही नहीं सकी …सोचने लगी आख़िर किस भूल की सजा पा रही है ….बच्चे जिनकी परवरिश इतने स्नेह और समय लगाकर की आज वही पढ़ लिख कर ज़रा समय और सम्मान क्यों नहीं दे पाते ।
बेटा तो पढ़ने के बाद विदेश क्या गया ..वहीं का हो कर रह गया ,बेटी की उचित वर से ब्याह कर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने की मंशा ने मीरा की नींद उड़ा रखी थी …पर करे तो भी क्या करे ?
उसे आज अपना बचपन और जवानी याद आ रही थी..
कभी हिम्मत ही नहीं हुई अपनी मन की बात कहने कि ….माता-पिता के पसन्द के परिवार में ब्याह दी गईं पर कभी अपने हक़ के लिए कुछ कह नहीं पाई ! आज बच्चों को अपनी मर्ज़ी का काम और पसंद का जीवन साथी चाहिए, पर अभिभावक जब उनकी ख़ुशी और सुरक्षा की दृष्टि से कुछ कहते है तो उन्हें अखरता है …
बार बार यही … अजीब कश्मकश में थी मीरा
सोचते सोचते सोफ़े पर ही सो गई !
सुबह दरवाज़े की घंटी से नींद उड़ी सामने एक दम्पति खड़े थे,हाथ जोड़ कर नमस्कार करते हुई महिला ने पूछा “आंटीजी क्या रमा यहीं रहती है ?”
हाँ में सर हिलाकर मीरा कुछ समझ सकती क्या कहती इसके पहले महिला ने एक जैकेट देते हुए कहा “ये रमा का है कल अस्पताल के बैंच पर भूल गई थी , वो क्या है ना रात सात बजे हमारे स्कूटर का एक्सिडेंट हो गया गाड़ी से , गाड़ी वाला तो टक्कर दे कर भाग गया पर मेरे बेटे के माथे पर चोट लग गई ! पीछे से रमा आ रही थी शायद अपने काम से लौट रही थी , पर फिर भी उसने हमारी मदद की ! बेटे को अस्पताल पहुँचाया और डाक्टरों से बात करके हमारी सुरक्षा का प्रबंध किया !पर बार बार उसे यही चिन्ता हो रही थी कि मम्मी को फ़िक्र हो रही होगी घर जाना है ! इसलिये हड़बड़ाहट में वो अपना जैकेट भूल गई !जैकेट की जेब में उसके कुछ काग़ज़ थे , वहीं से हमें आपका पता चला !
हम बहुत शुक्रगुज़ार है , सच बहुत अच्छी परवरिश की है आपने अपनी बेटी की “
जैकेट हाथ में ले कर ,उनके जाने के बाद मीरा फिर सोचने लगी क्या सिर्फ़ बड़ों की बातों का सम्मान होना चाहिए,पढ़ लिख कर बच्चे जब अपनी ज़िन्दगी के फ़ैसले लेने लगते हैं तो उनकी पसंद नापसंद में सहयोग देना माता-पिता का कर्तव्य नहीं ! एक हल्की सी मुस्कान के साथ मीरा रसोई की तरफ़ चल दी रमा के लिये नाश्ता बनाने …..

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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