लघुकथा : स्पार्किंग इनोवेशन – डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य , जबलपुर

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स्पार्किंग इनोवेशन

उस दिन जब मैं कांचघर क्षेत्र में रहने वाले अपने पत्रकार मित्र से मिलकर वापस अपने घर की ओर लौट रहा था , तब घमापुर चौराहे पर मुझे अरविन्द दिखा जो वहीं एक मेडिकल स्टोर्स में खड़ा था और संभवतः दवाईयां ही खरीद रहा था । मैंने तत्काल अपनी स्कूटी मोड़ी और उसके पास जाकर रूक गया , फिर अपनी कलाई पर बंधी हुई घड़ी पर उचटती सी नजर मारी उफ़ शाम के छै बजने ही वाले थे। तभी अरविंद दुकान से दवाईयां लेकर वापस मेरी ओर पलटा और बोला -“कहां से आ रहे हो यार ?
-” बस यूं ही कांच घर तक गया था ।”
-” अच्छा वो तुम्हारे उपन्यास का क्या हुआ , अच्छा सा नाम था ना वो – – – -” किया तमाशा दौलत ने ” मैं बोला ।
-” हां हां वो ही !
-” बहुत जल्द आ जाएगी मार्केट में मानस पाकेट बुक्स निकाल रही है इसको ।” मैंने बताया
-” वाह भई वाह बधाई हो
-” धन्यवाद भाई
-” अरे अब तो तुम खूब फेमस हो जाओगे , और रोकड़ा भी खूब मिलेगा तुमको ।” पता नहीं अरविंद दिल ही दिल में मुझसे जलने लगा था या उसने यूं ही बात कह दी थी अन्जाने में ।
-” अरविंद यार एक बात कहूं राज की
-” क्या ” वह चौंक कर मेरी ओर देखने लगा था
-” आज की तारीख में सिर्फ नामी गिरामी राइटर्स ही पैसा पैदा कर रहे हैं , अब वो चाहे रायल्टी का पैसा खींच रहे हैं या फिर घोस्ट राइटर्स से लिखवा कर खुद अपने लिए नांवा पीट रहे हैं ।” मै एक ही सांस में बोलता चला गया ।
-” अरे ऐसा क्या ? कहते अरविंद का मुंह खुला का खुला रह गया ।
-” हां अब हकीकत ये है कि मुझे अपने लिखे नावेल के लिए पहले अपने पास से रोकड़ा एडवांस में देना पड़ा है , इसके बाद छप कर मेरा नावेल मार्केट में आ रहा है ।”
-” इसमें तो रिस्क है भैया अगर लोगों को उपन्यास पसंद नहीं आया तो ?
-” पसंद नहीं आया तो जेब से लगाए खुद के पैसे डूब गए समझो और क्या, रिस्क तो मैंने लिया ही है ” किया तमाशा दौलत ने ” नामक उपन्यास लिखकर , लेकिन इस उपन्यास को लिखते समय ‘ स्पार्किंग इनोवेशन ‘ जैसे मजबूत शब्द को ध्यान में रखते हुए मैंने कुछ नए प्रयोग अपने उपन्यास में किए हैं ताकि नावेल मनोरंजक भी हो साथ ही साथ कुछ नए से तरीके किरदारों के द्वारा पाठक के ज़ेहन में परोसे जा सकें । ” मैंने इन शब्दों के साथ अपनी बात खत्म की ।
-” वाकई में यार आज की तारीख में लेखक या उपन्यासकार बनना आसान बात नहीं है ।”अरविन्द का सिर हिला ।
-” चलो ठीक है फिर मिलते हैं ।” कहते हुए मैंने अपना दायां हाथ आगे बढाकर अरविंद से हाथ मिलाया और अपनी स्कूटी स्टार्ट कर आगे बढ़ गया।
पीछे अरविंद खड़ा खड़ा मुझे जाता हुआ देखता रहा ।

– डॉ.मन्तोष भट्टाचार्य
जबलपुर
( म.प्र )

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