लघु कथा : भारतीय संस्कार – अलका मधुसूदन पटेल जबलपुर

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सकारात्मक लघु कथा

“भारतीय संस्कार” 

पेपर में परीक्षा परिणाम आया है ,सारे जिले से मनोज कुशवाहा ने टॉप किया है। और अचानक “उसी बच्चे की फोटो” देख उसकी खनकती मधुर आवाज और मीठी मुस्कुराहट याद हो आई। 
कुछ समय पूर्व हम सपरिवार सुदूर यात्रा करके अपने शहर पहुंचे राह में रुककर नारियल पानी पीने को गाड़ी रोकी। दुकान पर उपस्थित किशोरवय बच्चे को कार्यरत देखकर मन खिन्न हुआ। 
अति विनम्र होकर कुशलता से उसने नारियल काटकर हमें पकड़ाए।  ₹150 कीमत पूछकर हमने 200 ₹ पकड़ाए, ” बाकी तुम रख लो”। 
मना करने पर फिर स्नेह से कहा, 
“कीप इट अप माय डियर बॉय !”
—-“इट इज माय प्रिविलेज सर् ! बट आई वोंट टेक एनी एक्स्ट्रा मनी ,दिस इस इनफ फ़ॉर मी, थैंक यू !”
आश्चर्य होकर पूछा, “पढ़ते हो”।
“जी सर 10th क्लास ,क्राइस्टचर्च बॉयस में ,आज पिताजी आवश्यक कार्य से बाहर गए हैं तो उनका कार्य मैं संभाल रहा हूं।” शुद्ध हिंदी में उसने कहा।
चलते-चलते हमने पलटकर गर्वित होकर उसको पुनः देखा । 
आज उसी की फ़ोटो देखकर वही प्यारा चैतन्य तेजस्वी चेहरा मन में घूम रहा है—। जिसकी चमक को हार्दिक शुभाशीष देकर सोचते हैं कि “वास्तव में हमारी नई पीढ़ी को ऐसे ही संस्कारों की जरूरत है” ,जो ” आजीवन” प्रज्वलित रहें। 

अलका मधुसूदन पटेल
जबलपुर म प्र

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