समीक्षा : प्रश्नों से सीधे मुठभेड़ करती हुई सामाजिक सरोकार की कहानियां है हजार मुंह का रावण – डॉ.संध्या टिकेकर बीना

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समीक्षा

प्रश्नों से सीधे मुठभेड़ करती हुई सामाजिक सरोकार की कहानियां है हजार मुंह का रावण – डॉ.संध्या टिकेकर
बीना

पुस्तक चर्चा – हजार मुंह का रावण !
लेखक – विश्वनाथ शिरढोणकर
प्रस्तावना – डॉ . पद्मा सिंह,इंदौर
प्रकाशक – रवीना प्रकाशन , दिल्ली
मूल्य – 250रुपए

अपने समय के प्रश्नों से जूझते हुए समाज को नई दृष्टि से संपन्न करना, साहित्य की पहली और अंतिम शर्त है । वरिष्ठ लेखक विश्वनाथ शिरढोणकर हिंदी और मराठी के एक ऐसे ही लेखक हैं, जिनकी सामाजिक सरोकार की कहानियां ,अपने समय के प्रश्नों से सीधे मुठभेड़ करती हुई, जीने का नया मार्ग प्रशस्त करती हैं ।

विश्वनाथ शिरढोणकर जी का कथा संग्रह ‘ हजार मुंह का रावण ! ‘ पहले तो अपने शीर्षक से चौंकाता है, फिर उनकी कथाओं का कंटेंट किसी तिलिस्म की भांति , अपने निहितार्थों को खोलता चला जाता है। । दस सिरों वाले रावण की चारित्रिक बुराइयां आज हजारों की संख्या में होकर मनुज समाज में किस तरह से और कितने गहरे तक पैठ चुकी हैं ,इसका इशारा ये कहानियां देती हैं।

भारतीय जनमानस में रावण की स्मृति एक विद्वान किंतु चारित्रिक दृष्टि से पतित व्यक्ति के रूप में जीवित है । हमारी सांस्कृतिक संकल्पना में चरित्र ,बुद्धि और शक्ति से कहीं बहुत ऊपर का तत्व है ,जिससे किसी भी तरह से समझौता नहीं किया जा सकता । ‘हजार मुंह का रावण !’की कहानियों का केंद्रीय विषय और मूल चिंता भी वस्तुतः इसी चरित्र को बचाने की है। समाज इस चरित्र को मूल्यों के नाम से जानता है। जीवन मूल्यों के निरंतर क्षरण ने जीवन में अनेक जटिलताएं पैदा की हैं ।इन जटिलताओं से उपजे प्रश्न कथाकार को बेचैन करते हैं । यही बेचैनी उनकी कहानियों को गढ़ने का मूल स्त्रोत है।
इस कथा संग्रह की कुल 12 कहानियां इंसानी जीवन के उतार- चढ़ाव ,उसकी सोच ,उसके व्यवहार को पूरी वास्तविकता से अंकित करती हैं। मनुष्य समाज के भ्रष्ट आचरण को लेखक ने अनेक तरह से कथाओं में गूंथा है।
देश का लोकतंत्र आज भ्रष्टाचार में गले- गले तक डूबा हुआ है । ‘हजार मुंह का रावण ! ‘ इसीलिए अकड़ा -अकड़ा फिरता है कि लोग चाहे जितनी भी कोशिश क्यों न कर लें , वे उसे देश से भगा नही सकते।लोगों की निरंतर बढ़ती अनावश्यक जरूरतें और कमजोर मनोबल जब तक हैं ,तब तक रावण का कोई बाल बांका नहीं कर सकता । प्रजातंत्रात्मक सत्ता गरीबों का हर तरह से शोषण कर रही है ।इस सच को दिखाती, फैंटेंसी शैली की कहानी’ अपना लक पहन कर चलो ‘ कहती है कि गरीबी ,भूख , नग्नता , बदहाली यही गरीबों का अपना लक है और इसी को पहन कर उन्हें जिंदा रहना होगा । शुद्ध हवा , शुद्ध पानी , पर्याप्त प्रकाश जैसे प्राकृतिक अधिकार मांगने का उन्हें कोई हक नहीं है ।
दिखावा और संवेदनहीनता को लक्षित करतीं कहानियां’ कैंडलमार्च ‘,’ हंसना मना है ‘मूल्यों के पतन की बानगी है ।अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाने का मतलब है, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधा -सीधा हनन करना ,पर सत्ताधीश इसे अनुचित न मानकर , पुरजोर तरीके से लागू करते हैं – “आखिर बहुत विचार विमर्श के पश्चात और खुशामदी दरबारियों की सलाह से राजा ने तुरंत प्रभाव से हंसने -हंसाने पर पाबंदी लगा दी । हंसने -हंसाने को राष्ट्रीय शर्म घोषित किया गया। ”
अदम्य साहस और कुशल रणनीति से औरंगजेब के होश फाख्ता कर,अपने राज्य की रक्षा और उसका विस्तार करने वाले वीर शिवाजी के महत्व को आज लोगों ने न केवल भुला दिया है , वरन घोर उपेक्षा का पात्र तक बना दिया है । ‘पुतला’ में लेखक की पीड़ा भी यही है कि आज की युवा पीढ़ी को जिन वीर शिवाजी को अपने जीवन का आदर्श बनाना चाहिए था , उन्हीं की प्रतिमा के नीचे का चबूतरा , आवारागर्दी का केंद्र बना हुआ है । पुतले की नाक के नीचे कायरता और क्रूरता का खेल चलता है lधरना ,नारेबाजी ,चिल्लाचोट ,आत्मदाह, हंगामा जैसा कुछ न कुछ उस पुतले की भेंट चढ़ता रहता है और वातावरण को नकारात्मक बनाता रहता है ।
पद -प्रतिष्ठा का दुरुपयोग इन दिनों समाज का स्टेटस सिंबल बना हुआ है । ‘परिचित -अपरिचित ‘ , ‘मेरा बाप -तेरा बाप ‘, ‘मुख्यमंत्री ‘जैसी कहानियां पति -पत्नी ,पिता- पुत्र , गुरु -शिष्य के संबंधों के तार -तार होने के सच को उगलती हैं ।वे एक तरह से नागरिक चरित्र के पतन की कथा सी कहती हैं ।
संग्रह की सबसे सशक्त और स्त्री विमर्श की कथा ‘मृत्यु का सुख’ शरीर और आत्मा के अंतर्संबंध को समझने का एक नया विजन देती है। आत्मा के अमर, अजर, निरपेक्ष होने को सब जानते हैं लेकिन वही आत्मा धारित शरीर के सुख -दुख , मान- अपमान से प्रभावित हुए बिना भी नहीं रह पाती है। ताराबाई की देह से छूटी आत्मा , कुछ दिनों तक किसी अन्य शरीर में प्रविष्ट होना नहीं चाहती है ।पचास से भी अधिक वर्षों तक ताराबाई के शरीर में रहकर उसकी पीड़ा और अपमान की साक्षी बनी आत्मा बड़े अफसोस के साथ ईश्वर से प्रार्थना करती है कि ” हे ईश्वर मुझे ताराबाई का शरीर क्यों दिया? उसके शरीर के अंदर रहते हुए भी मैं किसी भी संकट में उसकी मदद नहीं कर सकी ।वास्तव में स्त्री जन्म बहुत ही कष्टप्रद है । अब फिलहाल मुझे पुनर्जन्म नहीं चाहिए ।थोड़े दिन मुझे ताराबाई की मृत्यु का सुख भोगने दो । ”
जीवन के तनाव , उपेक्षा ,एकाकीपन , अवसादी भावों को स्पर्श करती कहानियां’ रंगबिरंगी ‘,’आदमी से गधा बेहतर’,’मुझे जीना है ‘आदि प्रकारांतर से जिंदा रहने और जीने के अंतर को बड़ी बारीकी से रेखांकित करती कथाएं हैं ।
लगभग सभी कहानियों का चित्रण चाहे कितना भी कड़वा सच कहने वाला क्यों न हो , लेखक जिस बदलाव की अपेक्षा अपने पाठकों के बहाने समाज में चाहता है , उसके संकेत सीधे पाठकों के मन मानस तक बराबर पहुंचते हैं ।
लेखक विश्वनाथ जी मराठी भाषी हैं इसलिए उनकी इन हिंदी कहानियों में व्याकरण ,वाक्य संरचना एवं शिल्प के स्तर पर मराठी का प्रभाव अनेक जगह अनुभव होता है ,पर इससे कहानियों के रस ग्रहण में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती बल्कि अपने पाठकों को बांधकर रखने ,उन्हें झकझोरने और चिंतन के लिए प्रेरित करने की उनमें अपार क्षमता है।
संवेदनशील कथाकार विश्वनाथ शिरढोणकर जी अपनी इन कहानियों के जरिए राष्ट्र और समाज की नैतिक जमीन पर नागरिकों का जैसा चरित्र गढ़ना चाहते हैं , उसकी गूंज हर कहानी के ध्वन्यार्थ से साफ सुनाई पड़ती है ।मानो वे कहना चाहते हैं कि-
जिंदगी में कुछ न कुछ दुश्वारियां होंगी मगर
डर के छिप जाने से बेहतर , बेखौफ दो -दो हाथ कर ।
सामाजिक सरोकारों के वरिष्ठ लेखक शिरढोणकर जी का गंभीर लेखन आगे भी समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा । अनंत शुभकामनाएं ।

डॉ.संध्या टिकेकर
बीना

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