काव्य : नवरात्रि – डॉ. अग्निवेश श्रीवास्तव मुंबई,महाराष्ट्र

165

नवरात्रि

आया उत्सव शक्ति का, माता की श्रद्धा भक्ति का,
नौ रूपों मे आईं हैं, करुणा कशिश समायी है I

प्रथम रूप में पुत्री हैं ये , पर्वतराज हिमालय की,
नंदी जी वाहन बन सेवें, हैं जो शान शिवालय की,
एक हाँथ मे कमल है शोभे, एक हाँथ मे त्रिशूल,
भक्तों के कष्टों को हरती, क्षमा करे हर भूल I

द्वितीय रूप में ब्रह्माचारिणी बन कर करती तप,
एक हाँथ में कमंडल रखे एक हाँथ से जप,
सारे वैभव त्याग के माता, शिव में हो गयीं लीन,
योगिनी बन कर हमें सिखातीं, हों ब्रम्ह मे कैसे विलीन I

तीसरे रूप में चंद्रघंटा बनकर आतीं माता, दस भुजा और बाघ सवारी, चंद्र से शोभित माथा,
अश्त्र शस्त्र हैं गदा, त्रिशूल, धनुष बाण, तलवार, कमल, कमंडल, माला, घण्टी, अद्भुद ये अवतार I

चतुर्थ रूप में माँ कुष्मांडा लेती हैं अवतार, दिव्य शक्ति से स्वर्णिम कुम्भ में रचती ये संसार,
जग जननी बन माता करतीं ब्रम्हाण्ड का आभिर्भाव, दयालु, कृपालु, पालक, रक्षक, माता का है स्वभाव I

पंचम रूप में स्कंदमाता, वात्सल्य की छबि न्यारी, पुत्र कार्तिक गोद में लेकर करतीं सिंह सवारी, हाथों में बस कमल पुष्प और शस्त्र नही कोई भारी,
कौशल ज्ञान की दाता माता, आशीष मात्र उद्धारी I

षष्टम रूप में माता आयीं बनकर के कात्यायिनी, रौद्र रूप में माता बनती दुष्टों की भय दायिनी,
महिषासुर को हरने वाली शक्ती का ये रूप,
तलवार चमकती हाथ में और साथ चले वन भूप I

सप्तम रूप में कालरात्रि है माँ का काला वेश,
त्रिनेत्र धारी, चारभुजा और काया में आवेश,
खर सवार हो माता करती दुष्टों को भयभीत,
भक्त जनों पर करुणा करती माता की ये रीत I

अष्टम रूप में महागौरी की कही न जाए गाथा,
श्वेत वृषभ पर गौर वर्ण मे चतुर्भुजा हैं माता,
एक हाँथ में त्रिशूल है शोभित एक हाँथ मे डमरू,
सौम्य रूप और सौम्य स्वभाव को नत मस्तक मैं कर लूँ I

नवम रूप में माँ लक्ष्मी अब सिद्धि दात्री कहलातीं, कमल पुष्प पर विराजमान माँ रिद्धि सिद्धि लातीं,
शंख, गदा, पुष्प, चक्र की आभा, भाग्य में करती वृद्धि, असंभव को भी संभव करती, देती सुख समृद्धि I

माता का है अद्भुद उत्सव, नौ रंगों नौ वर्णो में, धरती में बस स्वर्ग मिलेगा, माता के पावन चरणों में I

डॉ. अग्निवेश श्रीवास्तव
मुंबई,महाराष्ट्र

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here