एक महान कर्मयोगी पंडित दीनदयाल उपाध्याय – मुकेश तिवारी वरिष्ठ पत्रकार ,ग्वालियर

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॥जन्म दिवस पर विशेष॥

एक महान कर्मयोगी पंडित दीनदयाल उपाध्याय

मुकेश तिवारी
वरिष्ठ पत्रकार

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म उत्तर प्रदेश के चंद्रभान नामक ग्राम में 25 सितंबर 2016 को हुआ था ,आप की माता का नाम रामप्यारी एवं पिता का नाम भगवती प्रसाद था, उपाध्याय जी के बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया,

फलत बचपन के उन सुहाने दिनों से वंचित हो गए ,जब खेलने और खाने की जगह उन्हें अभावों में जीना पड़ा,यही कारण था कि बचपन में ही कठिन परिस्थितियों से संघर्ष की और व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण कर लेने के बाद जीवन में उन्होंने संघर्ष से कभी मुंह नहीं मोड़ा, पिता के निधन के पश्चात इनके नाना चुन्नीलाल उन्हें अपने गांव धनकिया ले आए ,जब नाना नौकरी छोड़ कर अपने पैतृक घर गुड़की मंडई आ गए, तो वे नाना के साथ गुडकी मंडई आ गए ,दीनदयाल जी के 9 वर्ष के होने के बाद भी उनके अध्ययन की कोई संमुचित व्यवस्था नहीं थी अतः वे अपने मामा राधारमण के पास आ गए जो कि गंगापुर में सहायक स्टेशन मास्टर के पद पर पदस्थ थे, गंगापुर आने के पश्चात 1925 में उनकी शिक्षा विधिवत प्रारंभ हुई,वे गंगा पुर में 4 वर्ष तक रहे, गंगापुर मेंइससे आगे पढ़ाई की व्यवस्था नहीं होने से, अतः 2 जून 1929 को उन्होंने कोटा के एक स्कूल में दाखिला ले लिया , कक्षा 5 से 7 तक की पढ़ाई उन्होंने कोटा में की इसके बाद की पढ़ाई के लिए वे,राजगढ़ आ गये मामा राधारमण के चचेरे भाई नारायण शुक्ला राजगढ़ में स्टेशन मास्टर थे, आठवीं की शिक्षा प्राप्त करने के लिए
दाखिला लिया, उन्होंने अपनी कुशाग्र बुद्धि का परिचय अंकगणित के कठिन सवालो का जवाब पलक झपकते ही देकर दिया, जब वे 9 वी कक्षा में पढ़ रहे थे उस दौरान उनके पास दसवीं के विद्यार्थी भी उनसे गणित के सवाल हल करवाने आते थे,उनकी ख्याति एक मेधावी छात्र के रूप में फैल गई थी, नारायण शुक्ला का19 34 में स्थानांतरण सीकर हो गया,इस कारण उन्हें सीकर जाना पड़ा, उन्होंने दसवीं की परीक्षा सीकर कल्याण हाईस्कूल से दी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए,वह विधार्थी जीवन में हमेशा उच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण होते रहे ,इसी कारण सीकर के महाराजा कल्याण सिंह ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया,10रपये माहवार छात्रवृत्ति और पुस्तको आदि के लिए 250की राशि पारितोषिक के रूप में दी,उस दौर में पिलानी उच्च शिक्षा का प्रसिद्ध केन्द्र था, दीनदयाल इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए 1935मे पिलानी चले गए उन्होंने यह सभी परीक्षाएं विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की ,बीए की पढ़ाई के लिए कानपुर आ गए
कानपुर में किराए का मकान लेकर दो बषं तक रहे,इसके पश्चात वे प्रयाग चले आए,25वर्ष की आयु पूर्ण करने तक उपाध्याय जी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर रहे, कानपुर में अध्ययन करते वक्त अपने सहपाठी कालूजी महाशबदे के माध्यम से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए, कानपुर में संघ संस्थापक डां केशव बलिराम हेडगेवार से उनकी भेंट हुई,बाबा साहब आपके के दादा राव परमार्थ इनके छात्रावास में ही रूकते थे,इनकी दीनदयाल जी से बहुत बातें होती थीं, स्वातंत्र्य वीर सावरकर जब कानपुर आए तो दीनदयाल जी ने उन्हें शाखा पर आमंत्रित कर बौद्धिक वर्ग करवाया, कानपुर में सुन्दर सिंह भंडारी भी उनके सहपाठी थे, कानपुर में इस विधार्थी जीवन से ही पं दीनदयाल उपाध्याय के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हो गयी थी हालांकि संघ के शारीरिक कार्य कार्यक्रमो को दीनदयाल जी बेहतर ढंग से नहीं कर पाते थे मगर बौद्धिक परीक्षा में वे सदैव अव्वल रहते थे, दीनदयाल उपाध्याय जी ने सन् 1939 में सनातन धर्म कॉलेज कानपुर से बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की ,यही नहीं,एम ए अंग्रेजी साहित्य की परीक्षा में भी ,उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया , हालांकि बीमारी की वजह से वे एम ए उतराध की परीक्षा नहीं दे सके, मामा जी के अनुरोध करने पर वे प्रशासनिक परीक्षा में बैठे, उत्तीर्ण हुए और साक्षात्कार में भी वे चुन लिए गए लेकिन उन्होंने प्रशासनिक नौकरी करने में कतई दिलचस्पी नहीं दिखाई, अतः वे बीटी करने के लिए प्रयाग चले गए उनकी अध्ययनशीलता सावजनिक जीवन में जाने के पश्चात प्रखरतम होती चली गई ,कालांतर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय राजनीति ने जो जीवन उभरा वह उनका श्रषि व्यक्तित्व था,वे ताउम्र अविवाहित रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वे राजनीतिक क्षेत्र में गए और भारतीय जन संघ के महामंत्री बने ,उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखकर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि मुझे दो दीनदयाल जी मिल जाए तो मैं भारतीय राजनीति का मानचित्र बदल के रख दूंगा, भारतीय जनसंघ की स्थापना के दो वर्ष भी पूर्ण नहीं हो पाए थे काश्मीर आंदोलन के दौरान 23जून को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान हो गया, आजाद भारत के नवगठित राजनीतिक दल का भार पूण तौर पर 36 वर्षीय दीनदयाल उपाध्याय जी के कंधे पर आ गया,वे निरंतर17 सालों तक भारतीय जन संघ के महामंत्री रहे और 18 में बषं में जन संघ के अध्यक्ष बने लेकिन नियति ने उन्हें हमसे छीन लिया, दीनदयाल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था, वे सामान्य व्यक्ति,सक्रिय कार्यकर्ता कुशल संगठक, प्रभावी नेता एवं विचारक थे समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, राजनीति विज्ञानी एवं दार्शनिक एव अच्छे वक्ता थे ,किसी भी विषय पर अच्छी प्रकार से अभ्यास और विभिन्न कोणों से उस पर विचार व्यक्त करने के उपरांत ही अपना कोई मत व्यक्त करते थे ,उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक कुछ उदाहरणो से पता चलती है,
राष्ट्र, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति पर दीन दयाल जी के विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है ,उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक है राष्ट्र एक स्थाई सच है,राष्ट्र की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए राज्य पैदा होता है, राष्ट्र का संगठन के निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए उत्पन्न नहीं होताहै ,एक राष्ट्र भाव की विस्मृति के कारण घटक शिथिल पडते हैं और यदि पूरी तरह निषिक्रय हो गए, तो संपूर्ण राष्ट्र के विनाश का कारण भी बनते हैं, अतः हमें कालजेय स्थाई सक्षम, आत्मनिर्भर व्यवहारिकता और स्वाभाविक संगठन के लिए राष्ट्र को आधार मानना होगा, राष्ट्र का संगठन दृढ हुआ तो सामर्थ निर्माण होगा और विभिन्न अंग पुष्ट हो सकेंगे ,राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाने के लिए धर्म का संरक्षण करते हुए आना चाहिए ,यह संघटित कार्प शक्ति एवं पुरुषार्थ से ही प्राप्त हो सकता है, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन और संपूर्ण सृष्टि का विचार करती है, उसका दृष्टिकोण एकात्मक वादी है, टुकड़ों में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से उचित हो सकता है लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से यह कतई उपयुक्त नहीं है पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण उसका जीवन के संबंध में सतही ढंग से विचार करना है,
दीनदयाल जी का मानना था कि स्वराज प्राप्त करते ही हम स्ब की भावना विस्मित कर बैठे तथा विदेशी विचारधारा हमारे आकर्षण और अनुकरण का केंद्र बन गई ,आज आवश्यकता है कि अपने स्व का परिचय किया जाए, बिना उसके स्वराज का कोई अर्थ नहीं है स्वतंत्रता हमारे विकास और सुख का साधन मात्र नहीं बन सकती जब तक हमें अपनी हकीकत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और ना ही उसका विकास ही संभव है,हम स्वर की भावना किस मत कर बैठे हैं विदेशी विचारधारा मारे आकर्षण और अनुकरण का केंद्र बन गई आज आवश्यकता है कि अपने स्व का परिचय किया जाये कर विनाश के स्वराज का कोई अर्थ नहीं है, स्वतंत्रता हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती जब तक हमें अपनी हकीकत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं हो सकता और नहीं उसका विकास ही संभव है, पंडित दीनदयाल जी ने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने योग्य छोटे-छोटे आयामों का चिंतन करते हुए एकात्मक मानव बाद के माध्यम से जो दिशानिर्देश किया है वह अन्य सभी बातों से उठकर किसी भी राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्रोत है इसमें किसी भी प्रकार की संकुचित प्रवृत्ति का आभास भी नहीं होता ,राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति इस एकात्मक मानव बाद को भलीभांति समझ कर स्वयं के विकास और समाज के विकास के साथ ही संपूर्ण राष्ट्र को सर्वोच्च पर ले जाने में समर्थ होगा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी राष्ट्र निर्माण के कुशल शिल्पओं में से एक रहे हैं व्यक्तिगत जीवन तथा राजनीति में भी सिद्धांत और व्यवहार में समानता रखने वाली इस शख्सियत को तमाम सारे विरोधियों का सामना करना पड़ा किंतु राष्ट्रभक्ति जिनका मकसद हो ऐसे महापुरुष को भला कौन उसके लक्ष्य से डिगा सकता था।

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