काव्य : राष्ट्रकवि दिनकर – डॉ. अर्चना मिश्रा , दिल्ली

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राष्ट्रकवि दिनकर

दिनकर दिनकर के समान ही चमकते हुए रहे
अंधकार दूर कर प्रकाश बिखेरते रहे
मुखमंडल की आभा दमकी
औज रहा वाणी में
माधुर्यता थी स्वभाव में ,
पर दृष्टि बड़ी विलक्षण थी
अन्याय के ख़िलाफ़ रहे प्रयासरत
लेखनी को ही हत्यार बनाया
वीर रस के कवि महान
छायावाद के प्रमुख स्तम्भ
साम्यवाद का भी प्रभाव था
गांधी जी का दर्शन भी मन को हर्षाया था
इनकी ना कोई सानी थी
अपनी लेखनी को क़र करबद्ध
क्रांति का बिगुल बजाया
जाने कितने प्राणहीन लोगों के मन को चेताया ,
अपने युग के सूर्य कहलाये
इनकी सानी कोई कर ना पायें
साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ बड़ा असंतोष था ,
जमकर प्रहार किया शोषक पर
जहाँ ग़लत बात हुई वहाँ आपकी लेखनी हत्यार बन मौजूद रही
हिंदी से प्रेम बड़ा था , जहाँ हिंदी का अपमान हुआ
वहाँ रहना ना आपको मंज़ूर हुआ
नेहरू जी से भी करी बग़ावत
जो ग़लत नीतियों को लागू करना चाहा

देखने में देवता सदृश्य लगता है
बंद कमरे में बैठकर गलत हुक्म लिखता है।

जिस पापी को गुण नहीं गोत्र प्यारा हो
समझो उसी ने हमें मारा है॥

ऐसे बेबाक़ आप थे , हिंदी के लिए
हर तरफ़ से खड़े थे ।
राष्ट्र प्रेम था नस नस में जो लेखनी
के माध्यम से चरितार्थ हुआ
उर्वशी , कुरुक्षेत्र,रेणुका , रश्मीरथि ,
हुंकार जाने कितने असंख्य कृतियाँ रची हज़ार।
क्रांति का था बिगुल बजाया
सच में दिनकर दिनकर बन कर आया ।

डॉ. अर्चना मिश्रा
दिल्ली

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