काव्य : धोखेबाज़ – विनोद शर्मा गाजियाबाद

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गीत

धोखेबाज़

धोखेबाज़ फरेबी जग के,
किस तरह सोचते रहते |
कब कैसी वे चाल चलेंगे,
जोड गाँठ सारी करते ||

अपना कौन पराया किसका,
इसका कोई अर्थ नहीं |
मन में रहती हेरा फेरी,
अपना उल्लू करें सही ||
नैतिक नीति किसे कहते वे,
क्या क्या वे करते फिरते |
धोखेबाज़ फरेबी जग के,
किस तरह सोचते रहते ||1

पाप-पुण्य अरु झूठ-साँच का,
कभी प्रभाव नहीं होता |
बिगड़े नहीं काम उनका पर,
चाहे कोई हो रोता ||
कुटिल नीति अपनाते रहते,
बात किसी की नहिं सहते |
धोखेबाज़ फरेबी जग के,
किस तरह सोचते रहते ||2

चालबाज़ बन छल करते हैं,
कितने जाल बिछाते हैं |
बातों में फँस जांय लोग तब,
फिर वे लूट मचाते हैं |
कपट नीति के धनी बड़े वे,
पर सीधे साधे दिखते |
धोखेबाज फरेबी जग के,
किस तरह सोचते रहते |
कब कैसी वे चाल चलेंगे,
जोड़ गाँठ सारी करते |3

© विनोद शर्मा
गाजियाबाद

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