काव्य : नारी कोई तितली नही – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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नारी कोई तितली नही

नारी
कोई तितली नही
जिसकी स्वच्छंद उड़ान से
मन बहला कर
परों से पकड़ते हुए
उसकी उन्मुक्त साँसों को
पुस्तकिय पन्नों के बीच
दबोच लिया जाये..।
और
अपनी व्यस्तता से
उकता चुके मन को
वक्त बेवक्त
विश्राम देने के लिए
बाहर निकाल कर
अपनी करनी पर
पश्चाताप किया जाये….।
मौन रहकर
उससे पुनः उड़ान भरने की अपेक्षा की जाये,
ताकि हम अपना मन बहला सकें..।

माना उस समय
उसके परों पर
अपना आधिपत्य जमाने का
वह विरोध न कर सकी…।
पर वर्तमान में
वह भी
अपने अधिकारों के प्रति
जागरूक हो गई है…।
अपने हिस्से के आसमान पर
निर्भीकता से उड़ रही है…।
अपनी सर्वसम्पन्न प्रतिभा के बलबूते पर
हर क्षेत्र से जुड़ रही…।

देखकर लगता है,
आज की नारी
अपनी सामाजिक और
व्यवहारिक
भूमिकाओं का निर्वहन करते हुए
अपनी उत्कृष्ट पहचान स्थापित कर रही है..।
यही वजह है कि,
आज उसकी पहचान
महज
किताबी न हो कर
अनुकरणीय बनती जा रही है..।
और
तितलियों को कैद करने की
प्रथा थमती जा रही है।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

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