अभियंता दिवस : भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म दिवस है -रनवीर सिंह, ग्वालियर

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अभियंता दिवस

भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया – जन्म दिवस – 15 सितंबर

भारतीय संस्कृति में अपने पूर्वजों की याद में 16 दिवसीय श्राद पर्व मनाए जाते हैं । जो प्रति वर्ष एक दिन भाद्रपद माह की पूर्णमासी तथा आश्विन (क्वार) माह (प्रथमा तिथि से लेकर अमावस्या तिथि तक) की तिथियों के हैं । परिवार के पूर्वजों का देहावसान जिन तिथियों में हुआ उसी तिथि अनुसार इन तिथियों में अपनी श्रद्धानुसार उन्हें याद कर उनकी याद में उनके अच्छे कार्यों को याद कर प्रेरणा भी लेते हैं जिससे उनके महान कार्य व परम्पराओं का अनुसरण आगे होता रहे, जो जीवन उपयोगी है। इसी तरह की परंपरा जीवन के जन्मदिन को मनाकर करते हैं । महान व्यक्तित्व को इसलिए याद किया जाता है कि उनके कृतत्व अनुकरणीय और महान होने से जीवनपयोगी रहे है । इसी परंपरा अंतर्गत अभियंता दिवस मनाया जाता है । यह एक अलग संयोग है कि श्राद पक्ष और अभियंता दिवस एक ही अवधि में आए हैं ।
भारत में प्रति वर्ष 15 सितंबर को अभियंता दिवस (इंजीनियर्स डे) के रूप में मनाया जाता है । यह दिन भारत के महान अभियंता एवं भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म दिन है । विश्वेश्वरैया भारत के महान अभियन्ताओं (इंजीनियरों) में से एक थे, इन्होनें ही आधुनिक भारत की रचना की और भारत को नया रूप दिया । उनकी दृष्टि और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में समर्पण भारत के लिए असाधारण योगदान दिया था । सन 1955 में भारत के सर्वोच्च सम्मान “ भारत रत्न ” से विभूषित किया गया । भारत में उनका जन्म दिन अभियंता दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
जीवन परिचय – विश्वेश्वरैया जी का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक (तहसील) में 15 सितंबर 1861 को एक तेलगु परिवार में हुआ था । आपके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था । पिता संस्कृत के विद्वान और आयुर्वेदिक चिकित्सक थे । प्रारम्भिक शिक्षा जन्मस्थान से ही पूरी की । जब वे 15 साल के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था । आगे की पढ़ाई के लिए बंगलौर के सेंट्रल कालिज में प्रवेश लिया । लेकिन यहाँ उनके पास धन का अभाव था अत: उन्हें ट्यूशन करना पड़ा । विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया । इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कालेज में प्रवेश लिया । 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया । इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया ।
दक्षिण भारत के मैसूर (कर्नाटक) को एक विकसित एवं समृद्धिशाली क्षेत्र बनवाने में उनका अभूतपूर्व योगदान है । लगभग कई वर्ष पहले जब देश स्वतंत्र नहीं था, तब कृष्णराज सागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क्स, मैसूर संदल ऑइल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर सहित अन्य कई महान उपलब्धियां इनके कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई । इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भागीरथ भी कहते हैं । कृष्णराज सागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनती थी, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार (मसाला) तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था । 1912 में आपको मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था और 1918 में दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए । वर्ष 1947 में आप आल इंडिया मैन्युफ़ेक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने । वर्ष 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान “ भारत रत्न ” से नवाजा गया । जब वह एक सौ वर्ष के हुए तब भारत सरकार ने डाक टिकिट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया । 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को आपका स्वर्गवास हो गया । सन 1920 में रिकन्स्ट्रक्टिंग इंडिया तथा सन 1935 में प्लान्ड इकोनोमी फॉर इंडिया पर विशेष पुस्तक लिखी ।
ग्वालियर चंबल क्षेत्र – ग्वालियर में तिघरा बांध का कार्य भी हुआ, मुरैना जिलान्तर्गत पगारा डेम बिना सीमेंट के सीसा (प्लम्बस) से बना है, कोटा चंबल नहर पर सबलगढ़ के पास मिनी हायड्रो पावर हाउस देखने योग्य है । ग्वालियर जिले में स्थित हरसी बांध केवल मिट्टी से बना अनोखा बांध है, यह बांध मोहिनी सागर से तथा मड़ीखेड़ा हायड्रो पावर हाउस अथवा मड़ीखेड़ा बांध (शिवपुरी जिला) से निकले हुए पानी को हरसी बांध में एकत्रित कर वहाँ से सिंचाई की जाती है । इसी प्रकार ककेटों और पहसारी बांधों का पानी सिंचाई के साथ-साथ भी तिघरा बांध की जलापूर्ति करते हैं जिससे ग्वालियर का जीवन निर्भर रहता है । श्योपुर जिला अंतर्गत कूनो साइफन और कोटा श्योपुर के बीच बड़ोदा तहसील मुख्यालय से थोड़ी दूरी पर सबसे नीचे पार्वती नदी उसके ऊपर कोटा चंबल नहर और उन दोनों के ऊपर सड़क मार्ग सिविल के विशेष कार्य है, श्योपुर जिले की तहसील विजयपुर के पास सोलर पावर प्लांट दर्शनीय स्थल हैं । अशोकनगर जिलान्तर्गत चँदेरी के पास वेतवा नदी पर हायड्रो प्रोजेक्ट, राजघाट जहां से क्रमश: बिजली और सिंचाई व्यवस्था होती है दर्शनीय स्थल हैं । गुना जिले में गोपीकृष्ण सागर (एनएफएल व गेल तथा एलपीजी बोटलिंग प्लांट, नारायणपुरा शक्कर कारख़ाना, राघौगढ़, जेपी इंजीयरिंग कालिज के लिए) से पानी की उपलब्धता हो रही है । इसके अतिरिक्त संजय सागर और राजीव सागर बांध भी हैं, जिनसे सिंचाई होती है । राजीव सागर बांध के गेट औटोमेटिक (स्वचालित) गेट है ।
भवन निर्माण की पुरातन शैलियों/कलाकृतियों को भिंड जिले में अटेर किला, गोहद किला दर्शनीय स्थल हैं । जिला मुरैना अंतर्गत बटेश्वर-मंदिर, पढ़ावली, मितावली, ककनमठ, किला सबलगढ़, पहाड़गढ़ दर्शनीय स्थल हैं । शिवपुरी जिले में नरवर किला, सुरवाया गढ़ी, शिवपुरी के विभिन्न भवन, खनियाधना, पोहरी दर्शनीय हैं । श्योपुर जिला में श्योपुर किला, बड़ोडा किला, ढोंदपुर (नयागांव), गोठरा मुख्य हैं । दतिया जिले में दतिया महल/किला और जिला अशोकनगर में तूमैंन, ईसागढ़, आनंदपुर (ईसागढ़), कदवाया-मंदिर, चंदेरी किला व अन्य स्थल देखने योग्य हैं । जिला गुना के बजरंगगढ़, राघौगढ़, मधुसूदन गढ़, चाचौड़ा, गढ़ा, भदोरा, उमरी आदि मुख्य स्थल हैं । जिला ग्वालियर – किला ग्वालियर (मानसिंह महल, सहत्र बाहु (सास बहू) स्थल, तेलीमन्दिर, भीमसिंह राणा छत्री व ताल तथा गुरुद्वारा) गुजरी महल, तानसेन समाधि, मोती महल, सिंधिया पेलेस, बाड़ा-स्थित विभिन्न भवन, सूर्य मंदिर, बेहट किला, पिछोर (डबरा) किला आदि पुराने स्थल सिविल कलाकृति के नमूने और दर्शनीय स्थल हैं ।
वर्तमान में अभियंता दिवस पर अभियन्ताओं द्वारा विभिन्न कार्यक्रम प्रत्येक वर्ष आयोजित किए जाते हैं सराहनीय और अनुकरणीय हैं । जिनमें मुख्य विचार संगोष्ठी, वृक्षारोपण, रक्तदान, मरीजों को फल वितरण, प्लास्टिक के उपयोग न करने हेतु अन्य प्रकार के थैलों का वितरण, विशेष कार्य किए जाने, पदोन्नति, सेवानिवृत्ति पर उन्हें सम्मानित करना, श्रद्धांजलि समारोह, मुख्य रहते हैं ।
ग्वालियर चंबल संभाग अंतर्गत – ग्वालियर सिंचाई विभाग चंबल कालोनी कैम्पस और बिजली विभाग कैम्पस रोशनी घर, शिवपुरी बाण-गंगा स्थित विद्युत विभाग अधीक्षण अभियंता (महाप्रबंधक) कैम्पस, गुना – रेलवे स्टेशन के पास विद्युत विभाग अधीक्षण अभियंता (महाप्रबंधक) कैम्पस, श्योपुर विद्युत विभाग अधीक्षण अभियंता (महाप्रबंधक) कैम्पस, भिंड विद्युत विभाग अधीक्षण अभियंता (महाप्रबंधक) कैम्पस, और मुरैना विद्युत विभाग अधीक्षण अभियंता (महाप्रबंधक) कैम्पस में मूर्तियाँ भी स्थापित हैं जहां प्रतिवर्ष अभियंता एकत्र होकर श्रद्धांजलि समारोह भी आयोजित करते हैं ।

एक विचार – अभियंता दिवस पर
प्राय: सभी जिला मुख्यालयों पर एक मानस भवन स्थापित है, जो हिन्दी साहित्य के तुलसी दास जी की स्मृति से संबन्धित हैं जिनका सदुपयोग यथा स्थिति अनुसार होता रहता है । इस प्रकार जिला मुख्यालय पर शासन/प्रशासन, अभियन्ता, स्थानीय सहयोग के द्वारा एक अभियन्ता भवन का निर्माण हो, जो आगे भविष्य में सभी अभियन्ताओं को एक स्थान पर एकत्र करने के साथ आपसी विचार गोष्ठी के माध्यमों से तात्कालिक समस्याओं, तकनीकी विषयों पर अपने विचार और वहाँ उपलब्ध तकनीकी साहित्य का उपयोग और आसानी से हो सकेगा । सभी का चिंतन – इस कार्य के क्रियान्वन हेतु अपेक्षित है ।
वर्तमान परिपेक्ष में संघर्ष और चुनौतियाँ – वर्तमान में चार मुख्य बिन्दु हैं – विश्वबंधुत्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन)(वसुधैव कुटुम्बकम), उदारीकरण (लिबरलाइजेशन), प्रतिस्पर्धा (कंपटीशन) और पारदर्शिता (ट्रांसपेरेंसी)।
विश्व बंधुत्वीकरण एक ऐसा रास्ता जो कहता है कि आपके कार्य से दूसरे को कोई असुविधा/आपत्ति न हो । उदारीकरण – किसी के लिए अहितकर न हो, प्रतिस्पर्धा – विशेषकर समय और कार्य की गुणवत्ता, लागत को प्रभावित करती है । पारदर्शिता – कोई भी कार्य की गतिविधिया ऐसी न हो जिन्हें किसी को जानने में असुविधा हो ।
प्रौद्योगिकी (तकनीकी) क्षेत्र – ज्ञान (पांच इंद्रियों द्वारा – आँख, नाक, कान, जिव्हा और त्वचा जिनसे क्रमश: रूप, गंध, शब्द, रस और स्पर्श का ज्ञान) होता है । विज्ञान – क्रमबद्ध ज्ञान ही विज्ञान कहा गया है या विस्तृत ज्ञान ही विज्ञान है । विज्ञान का उपयोग अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) हैं और अर्थशास्त्रीय (ईकोनोमाइज्ड) उपयोग ही प्रौद्योगिकी (तकनीकी) हैं । जिसमे तकनीकी के टेक (TECH) से संबन्धित है । टी (T) – टाइम, ई (E) – एनर्जी, सी ( C ) – कोस्ट और एच (H) – हारमोनी (पसंद) हैं । उदाहरण के लिए एक वाहन जिसका मॉडल एक ही है, कंपनी ने समय, ऊर्जा और कीमत एक समान होते हुए केवल उसके रंग विशेष पर बिक्री होती है । जबकि मॉडल इंजीनिरिंग के हिसाब से एक है फिर भी ग्राहक/जनता की पसंद (वाहन का रंग) का ध्यान न रखा गया तो, उसके अनुरूप रंग न होने से उत्पाद नहीं बिकेगा । यह ग्राहक पर निर्भर करता है न कि उत्पादन पर, अत: उत्पादन कर्ता ही उसी रंग के उत्पाद बनाएगा जो ग्राहक की पसंद हैं यह भी प्रौद्योगिकी (तकनीकी) वालों की जबावदारी है । यही कारण है कि बीई (बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग) की डिग्री/उपाधि पहले और अब अधिकतर बीटेक (बेचलर ऑफ टेकनोलोजी) की डिग्री/उपाधि प्रदान की जाती है ।
वर्तमान में तकनीकी क्षेत्र में एक शब्द स्मार्ट (SMART) आया है जो बहुआयामी है स्मार्ट फोन, स्मार्ट वाहन, स्मार्ट सुविधा, स्मार्ट कार्य, स्मार्ट शहर आदि । इस प्रक्रिया में स्मार्ट (SMART) के ही अक्षरों से लिया गया है – जैसे – एस (S) – से स्पेसीफिक (विशेष) वह कार्य जिसको चिन्हित किया जा सके । एम (M) – से मेजरेबिल जिसका मापन (नाप-तौल) किया जा सके । ए (A) – से एसेप्टेबिल (स्वीकार योग्य) कार्य जिस उद्देश्य के लिए है, वह पूरा करता हो और स्वीकार योग्य हो । आर (R) – से रियल (वास्तविक) उस कार्य का वास्तविक स्वरूप/अस्तित्व हो केवल कागजी कार्यवाही न हो । और टी (T) – टाइम, समय सीमा हर कार्य की पूर्ण करने/होने की अवधि निश्चित होनी जरूरी है जिससे उसके अनुसार लक्ष्य को पूरा किया जाए, यदि लक्ष्य/समय तय नहीं होगा तो कार्य निश्चित रूप से समय सीमा में पूरा तो होगा भी नहीं, कार्य की गुणवत्ता और लागत दोनों प्रभावित होंगी ।
उपरोक्त के अतिरिक्त दो गंभीर चुनौतियाँ जो सभी को प्रभावित कर रहीं हैं – एक जल, दूसरा पर्यावरण – दोनों की स्थिति अन्यथा न लेते हुए दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है । मुझे याद है वह समय जब गाँव में दूध बेचना उचित नहीं माना जाता था । इसलिए नहीं कि वह एक व्यापार है, इसलिए कि जो दूध बेचेगा वह व्यापार के चक्कर में अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाएगा, यदि इतना दूध उत्पादन है कि अपने परिवार की व्यवस्था से अधिक है तो कोई बुराई नहीं । परन्तु वर्तमान काल में तो दूध की बात तो भूल जाओ, आज पानी बिक रहा है ! क्या कारण हैं ? पानी की कमी, पानी की शुद्धता दोनों ही हैं । कौन दोषी है ? क्या इसमें हम सम्मलित नहीं है, उत्तर हाँ में ही मिलेगा, तो क्यों हम सब इस दायित्व को न निभाएँ ? पानी की कमी – पानी का दुरुपयोग, क्या पानी की कमी से संबन्धित नहीं है, यदि है तो आवश्यकता अनुसार उपयोग किया जाय और उपलब्धता हेतु प्रयास । वृक्षारोपण दूसरा वाटर हार्वेस्टिंग अथवा हर गाँव-शहर-क्षेत्र का अपना तालाब/पोखर/बांध हो । प्रकृति द्वारा कितने जंगलों/नदियों का संचालन हो रहा है ? क्या हम अपने जीवन में किसान हैं तो कम से पाँच पौधे (जिसमें एक या दो फलदार शेष छायादार) अन्य जिनके पास भूमि उपलब्ध नहीं है वे किसी सार्वजनिक स्थल या अपने निवास स्थल और गमले मे भी पौधे लगा सकते हैं यह कार्य दोनों उद्देश्य जल संरक्षण और पर्यावरण के लिए लाभकारी है । हम कितना ही सुंदर और आलीशान भवन बना ले, तब हम थोड़ी सी खाली जमीन/भूमि/स्थान अवश्य छोड़े जहां पर वाटर हार्वेस्टिंग हो सके । मल्टी बिल्डिंग वाले भी गमलों का उपयोग कर सकते हैं । शासकीय, सामाजिक संस्थाएं, पंचायत, नगर पंचायत, नगर निगम, स्वशासीय संस्थाए कोंक्रीट के कार्य के स्थान पर पेवर ब्लॉक के प्रयोग को वरीयता दें, निश्चित रूप से वाटर हार्वेस्टिंग होगा, यह सभी आप सभी पेट्रोल पंपों पर देख सकते हैं, यद्यपि वहाँ यह कार्य दूसरे सुरक्षा कारणों से किया जाता है, हम वाटर हार्वेस्टिंग कारणों से करलें लाभकारी होगा । यह प्रयास भी सुनिश्चित किया जाए गाँव/शहर का अपना पोखर/तालाब/बांध हो जहां वर्षात का पानी एकत्रित हो सके और जरूरत के समय काम आए । पर्यावरण के लिए वृक्षारोपण पर तो चर्चा हो गई है । आप याद करें जब हम प्लास्टिक का उपयोग नही करते थे तब क्या जीवन के कार्य नहीं होते थे ? कार्य होते थे । फिर आज ऐसी क्या मजबूरिया/कमज़ोरियाँ आ गईं कि कपड़े का एक थैला/बैग हाथ, वाहन के साथ नहीं रख सकते, रख सकते हैं । प्रयास करे जब भी घर से बाहर जाएँ अपने साथ अपने घर से कपड़े का थैला/बैग अवश्य ले जाएँ, धूम्रपान की तरह प्लास्टिक से “ ना ” कहें । निश्चित रूप से आपका योगदान पर्यावरण के लिए होगा, भले ही आप पर्यावरण को प्रभावित न करते हों । जैसे एक रेलगाड़ी का इंजन सभी प्रकार की सवारियों (प्रथम, द्वितीय, अन्य श्रेणी, बिना टिकिट, माल/सामग्री) का परिवहन करता है, सभी को एक गति से ले जाता है । यही उत्तरदायित्व एक अभियंता (इंजीनियर) का है कि रेल के इंजन की तरह अपने उद्देश्यों अनुसार एकरूपता से कार्य करे, निश्चित रूप से गंतव्य तक स्वयं और सभी को पहुंचाएगा ।
अभियंता दिवस पर श्रद्धांजलि के साथ, अभियंता और सामाज जीवन की खुशहाली/समृद्धि की शुभ आशाओं के साथ ।

रनवीर सिंह,
सेवानिवृत्त
अति मुख्य अभियंता विद्युत विभाग

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