हिंदी साहित्य में छायावाद के युग प्रवर्तक सुमित्रानंदन पंत का योगदान -ललिता नारायणी प्रयागराज

89

हिंदी साहित्य में छायावाद के युग प्रवर्तक सुमित्रानंदन पंत का योगदान

कविवर सुमित्रानंदन पंत प्रकृति चित्रण के अमर गायके
थे । छायावाद के इस युग प्रवर्तक कवि ने 7 वर्ष की उम्र से 77 वर्ष की आयु तक अनवरत हिंदी साहित्य की अप्रतिम सेवा की ।
संस्कृत निष्ठ खड़ी बोली और छायावादी शैली में विपुल साहित्य का सृजन किया , युगवाणी , लोकायतन , चिदंबरा , स्वर्ण किरण , उत्तरा , अतिमा , जैसी महान रचनाओं के अतिरिक्त वीणा ग्रंथि ,पल्लव , गुंजन , युगांत जैसी अनेकानेक काव्य रचनाएं कवि की रचना धर्मिता की अनूठी मिसाल है । पंत जी सौंदर्य के उपासक थे , इनकी अनुभूति के तीन मुख्य केंद्र रहे प्रकृति नारी तथा कला सौंदर्य , पंत जी व्यक्तिवादी कलाकार के समान अंतर्मुखी बनकर अपनी कल्पना को असीम गगन में खुलकर विचरण करने के लिए मुक्त करते हैं ।

मधुरिमा के मधुमास
मेरा मधुकर का -सा जीवन

कवि का प्रिय रस श्रृंगार ही रहा …परंतु इन के काव्य में शांत , अद्भुत , करुण रौद्र रस का भी सुंदर परिवाक हुआ है । कविवर पंथ कविता की भाषा के लिए दो गुणों को आवश्यक मानते थे ।चित्रात्मकता और संगीतात्मकता इनकी प्रकृति संबंधी कविताओं में इस कलाका चरमोत्कर्ष दिखाई पड़ता है ।

ललिता नारायणी
प्रयागराज

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here