लघुकथा : क्या? होता क्या? दुनियाँ रूक जाती -आर के तिवारी सागर

126

लघु कथा

क्या? होता क्या? दुनियाँ रूक जाती

एक बार मुझे किसी काम से अपनी बहिन के घर जाना था। मैं रेल्वे स्टेशन पर अन्य लोगों की तरह गाड़ी आने का इन्तज़ार कर रहा था कि तभी *मेरी नजर एक सुन्दर लड़की पर पड़ी। वह करीब बीस बाईस वर्ष की होगी मुझे वह कुछ अजीब लगी, उसे देखकर जाने क्यों मैं उसकी ओर आकर्षित हो गया था। बात ही कुछ ऐसी थी, मुझे लगा वह भी गाड़ी की ही राह देख रही थी कि कब आने वाली है। मुझे वह अकेली और बेचैन सी लग रही थी।‌ उसे देख मैं अपना जाना भूल सा गया “मेरा पूरा ध्यान” उसी पर था। गाड़ी आने वाली थी उसके आने की सीटी भी बज गई थी। मैंने देखा वह सतर्क हो यहां वहां देखने लगी। जाने क्यों? मेरी भी बेचैनी बढ़ गई थी। उस लड़की को देखकर लगता था शायद मैं जानता हूं उसे। डिब्बे में चढ़ने वाले लोगों की भीड़ की अफरा – तफरी मच गई थी। मैं भीड़ से निकलकर उसी की ओर लपका,मुझे पता नहीं मैं क्यों उसी ओर खिंचा चला गया। तभी गाड़ी की तेज आवाज आने लगी। वहां सबको अपनी-अपनी पड़ी थी, पर मेरी नजर उसी लड़की पर ही लगी थी। गाड़ी की धक धक के साथ मेरे दिल की भी धक धक बढ़ गई थी। अब तक मैं उसके बहुत करीब पहुंच गया था,पर वह इस सबसे बेखबर थी तभी गाड़ी प्लेटफार्म पर आई ही थी कि लड़की ने गाड़ी के सामने छलांग लगा दी पर “पलक झपकते” ही मैंने उसका बाजू पकड़ कर उसे खींच लिया, “एक छपाक की आवाज” के साथ वह प्लेट फार्म पर गिर गई। अब तक कई लोगों की नज़र भी मुझ पर पड़ गई थी वह सब देख कई लोगों की चीखें निकल गईं। तभी और भी मसीहा मदद को आ गए थे, किसी ने मुझको संभाला किसी ने उसको संभाला। “मैंने उससे पूछा क्या कर रही थी? क्या मरना चाहती थी?” वह रोने लगी और चीख-चीख कर कहने लगी हां मैं मरना चाहती थी, हां मैं मरना चाहती थी! मैंने बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ रख कर इतना ही कहा “बेटा” तेरे मरने से क्या होता ? क्या दुनियाँ रूक जाती? नहीं! मैं कहता हूँ नहीं रूकती। “बस कुछ समय तक” पर फिर सामान्य होकर पहले के ही तरह दौड़ने लगती* । मेरी बात सुनकर वह अजीब सी नजरों से मुझे देखने लगी। शायद वह मेरी बात को समझ रही थी *क्या होता? क्या दुनियाँ रूक जाती?* तब वह अपनी नासमझी पर आंसू बहाने लगी।

आर के तिवारी
सागर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here