पुस्तक चर्चा : पाठकों को काव्यगत आनन्द देती है श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद – चर्चाकार : विवेक रंजन श्रीवास्तव,भोपाल

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पुस्तक चर्चा

पाठकों को काव्यगत आनन्द देती है श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद

दुख के महासागर मे जो मन डूब गया हो
अवसाद की लहरो मे उलझ ऊब गया हो
तब भूल भुलैया मे सही राह दिखाने
कर्तव्य के सत्कर्म से सुख शांति दिलाने
पावन पवित्र भावो का संधान है गीता

है धर्म का क्या मर्म , कब क्या करना सही है
जीवन मे व्यक्ति क्या करे गीता मे यही है
पर जग के वे व्यवहार जो जाते न सहे है
हर काल हर मनुष्य को बस छलते रहे है
आध्यात्मिक उत्थान का विज्ञान है गीता
करती हर एक भक्त का कल्याण है गीता

श्रीमदभगवदगीता एक सार्वकालिक वैश्विक ग्रंथ है . इसमें जीवन के मैनेजमेंट की गूढ़ शिक्षा है. धीरे धीरे संस्कृत जानने समझने वाले कम होते जा रहे हैं . किन्तु गीता में सबकी रुचि सदैव बनी रहेगी , अतः संस्कृत न समझने वाले हिन्दी पाठको को गीता का वही ज्ञान और काव्यगत आनन्द यथावत मिल सके इस उद्देश्य से संस्कृत मर्मज्ञ , शिक्षाविद , आध्यात्मिक तथा राष्ट्रीय भावधारा के कवि प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” ने मूल संस्कृत श्लोक , फिर उनके द्वारा किये गये काव्य अनुवाद तथा शलोकशः भावार्थ को बढ़िया कागज व अच्छी प्रिंटिंग के साथ यह बहुमूल्य कृति प्रस्तुत की है . अनेक शालेय व विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमो में गीता के अध्ययन को शामिल किया गया है , उन छात्रो के लिये यह कृति बहुउपयोगी बन पड़ी है . स्वयं हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने अनेक राष्ट्राध्यक्षो को भेंट में भगवत गीता की प्रतियां भेंट में दी हैं . भगवत गीता की विशद टीकायें , अनेकानेक भाषाओ में अनुवाद के साथ ही कई रचनाकारों ने हिन्दी में भी इसके अनुवाद किये हैं . गीता के अध्येता भविष्य में भी ऐसा करते रहेंगे ,क्योंकि गीता का मनोयोग से अध्ययन हृदय को स्पंदित करता है . प्रेरणा देता है . राह दिखाता है .

भगवान कृष्ण ने द्वापर युग के समापन तथा कलियुग आगमन के पूर्व (आज से पांच हजार वर्ष पूर्व) कुरूक्षेत्र के रणांगण मे दिग्भ्रमित अर्जुन को , जब महाभारत युद्ध आरंभ होने के समस्त संकेत योद्धाओ को मिल चुके थे, गीता के माध्यम से ये अमर संदेश दिये थे . गीता के इन सूत्र श्लोकों के जरिये जीवन के मर्म की व्याख्या की गई है .श्रीमदभगवदगीता का भाष्य वास्तव मे ‘‘महाभारत‘‘ है। गीता को स्पष्टतः समझने के लिये गीता के साथ ही महाभारत को पढना और हृदयंगम करना भी आवश्यक है। महाभारत तो भारतवर्ष का क्या ? मानव इतिहास है। ऐतिहासिक एवं तत्कालीन घटित घटनाओं के संदर्भ मे झांककर ही श्रीमदभगवदगीता के विविध दार्शनिक-आध्यात्मिक व धार्मिक पक्षो को व्यवस्थित ढ़ंग से समझा जा सकता है।

जहॉ भीषण युद्ध, मारकाट, रक्तपात और चीत्कार का भयानक वातावरण उपस्थित हो वहॉ गीत-संगीत-कला-भाव-अपना-पराया सब कुछ विस्मृत हो जाता है फिर ऐसी विषम परिस्थिति मे ज्ञान चर्चा की कल्पना बडी विसंगति जान पडती है। क्या रूदन में संगीत संभव है? किंतु यह संभव हुआ है- तभी तो गीता के माहात्म्य में कहा गया है ‘‘गीता सुगीता कर्तव्य‘‘ । अतः संस्कृत मे लिखे गये गीता के श्लोको का पठन-पाठन भारत मे जन्मे प्रत्येक भारतीय के लिये अनिवार्य है। संस्कृत भाषा का जिन्हें ज्ञान नहीं है- उन्हे भी कम से कम गीता और महाभारत ग्रंथ क्या है ? कैसे है ? इनके पढने से जीवन मे क्या लाभ है ? यही जानने और समझने के लिये भावुक हृदय प्रो चित्र भूषण जी ने साहित्यिक श्रम कर कठिन किंतु जीवनोपयोगी संस्कृत भाषा के इन सूत्रो का पद्यानुवाद कियाहै, और युगानुकूल सरल करने का प्रयास किया है।

साहित्य मनीषी कविश्रेष्ठ प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव जी , जो न केवल भारतीय साहित्य-शास्त्रो धर्मग्रंथो के अध्येता हैं बल्कि एक कुशल प्रवक्ता भी हैं , वे स्वभाव से कोमल भावो के भावुक कवि भी है। निरंतर साहित्य अनुशीलन की प्रवृत्ति के कारण विभिन्न संस्कृत कवियो की साहित्य रचनाओ पर हिंदी पद्यानुवाद भी आपने प्रस्तुत किया है . महाकवि कालिदास कृत ‘‘मेघदूतम्‘‘ व रघुवंशम् काव्य का आपका पद्यानुवाद दृष्टव्य , पठनीय व मनन योग्य है।गीता के विभिन्न पक्षों जिन्हे योग कहा गया है जैसे विषाद योग जब विषाद स्वगत होता है तो यह जीव के संताप में वृद्धि ही करता है और उसके हृदय मे अशांति की सृष्टि का निर्माण करता है जिससे जीवन मे आकुलता, व्याकुलता और भयाकुलता उत्पन्न होती हैं परंतु जब जीव अपने विषाद को परमात्मा के समक्ष प्रकट कर विषाद को ईश्वर से जोडता है तो वह विषाद योग बनकर योग की सृष्टि श्रृखंला का निर्माण करता है . और इस प्रकार ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्म योग, भक्तियोग, उपासना योग, ज्ञानयोग , कर्मयोग , विभूति योग, विश्वरूप दर्शन विराट योग, सन्यास योग, विज्ञान योग, शरणागत योग, आदि मार्गो से होता हुआ मोक्ष योग प्रशस्त होता है . प्रकारातंर से विषाद योग से प्रसाद योग तक यात्रा संपन्न होती है।

इसी दृष्टि से गीता का स्वाध्याय हम सबके लिये चरित्र निर्माण , किंकर्तव्यविमूढ़ पलों में जीवन की राह ढ़ुंढ़ने में उपयोगी हैं .
अनुवाद में प्रायः दोहे को छंद के रूप में प्रयोग किया गया है . कुछ अनूदित अंश इस तरह हैं ..

पहला ही श्लोक है
धर्म क्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय

शब्दशः अनुवाद किया गया है
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध हेतु तैयार
मेरों कापाण्डवों से संजय क्या व्यवहार

पहले ही अध्याय के २० वें श्लोक वें श्लोक में आत्मा की अमरता इस तरह प्रतिपादित की गई है …

आत्मा शाश्वत अज अमर , इसका नहीं अवसान
मरता मात्र शरीर है , हो इतना अवधान

भावार्थ भी नीचे दिया गया है …

आत्मा न तो किसी काल में जन्म लेती है , और न ही मरती है . आत्मा अजन्मी नित्य , सनातन , और पुरातन है . शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मरती .

एक चर्चित श्लोक है …
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय , नवानि गृहृणाति नरोपराणी
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्ययानि संयाति नवानि देहि

पदयानुवाद किया गया है …
जीर्ण वसन ज्यों त्याग नर , करता नये स्वीकार
त्यों ही आत्मा त्याग तन , नव गहती हर बार

अध्याय ५ कर्म सन्यास योग है जिसके ८वें और ९वें श्लोक का भावानुवाद है …

स्वयं इंद्रियां कर्मरत,करता यह अनुमान
चलते,सुनते,देखते ऐसा करता भान।।8।।
सोते,हँसते,बोलते,करते कुछ भी काम
भिन्न मानता इंद्रियाँ भिन्न आत्मा राम।।9।।

इसी अध्याय का २९वां श्लोक है

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌ ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

हितकारी संसार का,तप यज्ञों का प्राण
जो मुझको भजते सदा,सच उनका कल्याण।।29।।

अध्याय ९ से ..

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ॥
मै ही कृति हूँ यज्ञ हूँ,स्वधा,मंत्र,घृत अग्नि
औषध भी मैं,हवन मैं ,प्रबल जैसे जमदाग्नि।।16।।

इस तरह प्रो श्रीवास्तव ने श्रीमदभगवदगीता के श्लोको का पद्यानुवाद कर हिंदी भाषा के प्रति अपना अनुराग तो व्यक्त किया ही है किंतु इससे भी अधिक सर्व साधारण के लिये गीता के दुरूह श्लोको को सरल कर बोधगम्य बना दिया है .गीता के प्रति गीता प्रेमियों की अभिरूचि का विशेष ध्यान रखा है । गीता के सिद्धांतो को समझने में साधको को इससे बडी सहायता मिलेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। अनुवाद बहुत सुदंर है। शब्द या भावगत कोई विसंगति नहीं है। गीता के अन्य अनुवाद या व्याख्यायें भी अनेक विद्वानो ने की हैं पर इनमें लेखक स्वयं अपनी संमति समाहित करते मिलते हैं जबकि इस अनुवाद की विशेषता यह है कि प्रो श्रीवास्तव द्वारा ग्रंथ के मूल भावो की पूर्ण रक्षा की गई है।

आखिरी अठारहवें अध्याय के अंतिम श्लोक का अनुवाद है …
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैंतथा धनुर्धर पार्थ
विजय सुनिश्चित वहाँ ही , मेरी मति निस्वार्थ

अंत में यही कहूंगा कि

श्री कृष्ण का संसार को वरदान है गीता
निष्काम कर्म का बडा गुणगान है गीता

तो घर पर गीता को केवल पूजा के स्थान पर अगरबत्ती लगाने के लिये न रखें . उसे पढ़ने की टेबल पर रखें , और ऐसा माहौल बनायें कि बच्चे इसे पढ़ें समझें . आवश्यक हो तो बच्चो के लिये हिन्दी या अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध करवायें .

कृति … श्रीमदभगवदगीता हिन्दी पद्यानुवाद
पद्य अनुवादक …. प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ” विदग्ध ”
मूल्य …. ४५० रु , पृष्ठ … २५४
पुस्तक प्राप्ति हेतु पता … ए २३३ , ओल्ड मीनाल , भोपाल , ४६२०२३
चर्चाकार … विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

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