लघुकथा : संकटमोचक – श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल जबलपुर म प्र

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सकारात्मक लघुकथा
      संकटमोचक

सरकारी सेवारत नवयुवा उच्चाधिकारी *सिंह साहब* ने *जरूरतमंद बच्चों* को बुलाकर स्कॉलरशिप फॉर्म भरवाकर स्वीकृत किया,साथ ही वर्तमान आवश्यक सहायता के लिए अपने अकाउंट से ही कुछ राशि प्रदान करके गर्वित हुए। बच्चों को कृतज्ञता का अवसर दिए बिना कहा, ” *जब तुम कुछ बन जाओ तो जरूरतमंदों हेतु  सहयोग को हमेशा तत्पर रहना*।” ——-
—– *दादाजी* की महत्वाकांक्षा पूर्ण करके प्रतीक ने देश की सर्वोच्च परीक्षा *आईआईटी* में अप्रतिम सफलता प्राप्त की। उनकी पेंशन और मां के अन्य घरेलू कार्यों की मदद से, पिता के ना रहने पर भी उसकी और बहन की पढ़ाई नियमित बनी रहती। अभी एक वर्ष भी नहीं बीता कि दादाजी के अचानक चले जाने से पढ़ाई में *आकस्मिक व्यवधान* आन पड़ा। बड़े संस्थान में कोई सोर्स सिफारिश नहीं ,न कोई सहायता। *चिंतित होकर संकटग्रस्त भयभीत*।
पढ़ाई हेतु स्कॉलरशिप व्यवस्था या अन्य कहीं से सहायता की सोच भी पाता कि– ,कॉलेज से तुरंत ज्वाइन करने का फरमान – । शायद वहां पहुंचकर कुछ समाधान निकल पाए। पहुंचा तो पाया उसकी, पहले सेमेस्टर की फीस भरी जा चुकी है व दूसरी का निदान भी हो चुका है।
फिलहाल *चिंता की जरूरत नहीं*,धीरज से काम होगा। जानकारी से पता चला कि जिस फर्म में पहले उसके पिताजी ने काम किया है, उनके *बड़े अधिकारी* ने यह कार्य किया है, इस शर्त पर कि उसे पढ़ने में कोई ढील नहीं देनी है पूर्वानुसार *उत्कृष्ट परिणाम* प्रदर्शित करना है । वर्ष बीतते ही उसको *स्कॉलरशिप* मिलना आरंभ हो गया। 
—–कुछ लोग *अंधरे* में रहकर बड़े कार्य करते हैं, *नेक कार्य गुप्त* रखकर सार्थक होते हैं तो उनको सम्मान देने में हम कमी क्यों करते हैं। समाज के *कर्णधार* बनके वे अपनी सम्पूर्ण *उदारता ,आत्मीयता और निस्वार्थता* से तैयार रहते हैं।—किसी को *शर्मिंदगी* उठाने का अवसर दिए बिना ,सह्रदयता से सम्बल बनकर *संकटमोचक* बन जाते हैं। यही सीख देती हमारी *भारतीय संस्कृति* की *विशेषता* है।
अपने बड़ों का *अनुसरण* करते—प्रतीक ने अपने मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले व अन्य दोस्तों के साथ *विशेष फंड* निर्मित किया है। जहां से अचानक किसी को अगर बड़ी समस्या आ जाए तो भटकना न पड़े और उनकी *समस्याओं का समाधान त्वरित* हो सके।  

श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल
जबलपुर म प्र

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