समीक्षा : कार्यालयों की वर्तमान शासन प्रणाली पर गहरा कटाक्ष है व्यंग्य संकलन ये मुंह और मसूर की दाल -विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

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पुस्तक चर्चा

कार्यालयों की वर्तमान शासन प्रणाली पर गहरा कटाक्ष है व्यंग्य संकलन ये मुंह और मसूर की दाल

ये मुंह और मसूर की दाल
व्यंग्य संकलन
व्यंग्यकार … डा महेंद्र अग्रवाल
प्रकाशक .. समन्वय प्रकाशन , गाजियाबाद
मूल्य २५० रु , पृष्ठ १०८ संस्करण २०२०
चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

१९५७ में एक फिल्म आई थी ” बारिश ” , इसका टाइटिल सांग लता मंगेशकर जी ने गाया था ” ये मुंह और दाल मसूर की , जरा देखो तो सूरत हुजूर की ” . ” ये मुँह और मसूर की दाल” हिन्दी की एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है . मसूर की दाल की तासीर गर्म होती है . इसे पचाने में सामान्य से अधिक समय लगता है . जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो उन्हें ये दाल कम ही खानी चाहिए . व्यंग्यकार के लिए भी समाज की विडंबना को पचा पाना कठिन होता है । आगरे की सुप्रसिद्ध दालमोठ में मसूर की साबुत दाल का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है . शायद यही कारण होगा कि अपनी हैसियत से अधिक पाने की इच्छा करने वाले के लिये इस लोकोक्ति का प्रयोग करते हैं . किताब के शीर्षक के रूप में मुहावरों का बहुत हुआ है पर “ये मुंह और मसूर की दाल” का शीर्षक मैं पहली बार ही देख रहा हूं . वास्तव में पुस्तक का शीर्षक लिखना लगभग उतना ही दुष्कर होता है जितना कि पुस्तक लिखना , क्योंकि शीर्षक ही वे शब्द होते हैं जो पाठक को बुकस्टाल पर किताब उठाने के लिये आकर्षित करते हैं . व्यंग्य संग्रहों का नाम किताब के किसी प्रतिनिधि व्यंग्य पर रखना प्रचलित परम्परा है . इस दृष्टि से इस शीर्षक से व्यंग्यकार डा महेंद्र अग्रवाल ने किताब के अपने व्यंग्य “ये मुंह और मसूर की दाल” का अच्छा उपयोग किया है . इस व्यंग्य की बुनावट उन्होंने इस तरह की है कि माँ सरस्वती से एक याचक जानना चाहता है कि इस मुहावरे में मसूर की दाल का ही प्रयोग क्यों किया गया है , वीणापाणि विचलित हो जाती हैं तब नारद जी उन्हें सुझाव देते हैं कि किसी अकादमी के अध्यक्ष को जाँच सौंप दी जाये और याचिका कर्ता को सूचित कर दीजीये कि यथोचित कार्यवाही की जा रही है और यथासमय परिणाम सूचित किया जावेगा . इस तरह महेंद्र जी कार्यालयों की वर्तमान शासन प्रणाली पर गहरा कटाक्ष करते हैं . व्यंग्य में याचिका निपटाने के सारे अन्य तौर तरीको की विशद व्याख्या मनोरंजक तरीके से करने में वे सफल हुये हैं . मैं स्वयं पब्लिक डीलींग में उच्च पद पर था अतः व्यंग्य पढ़ते हुये मैं अनेक बार अपनी स्मित मुस्कान रोक नहीं सका . इस एक बानगी से ही किताब में संग्रहित व्यंग्य लेखों के तेवर , लेखक की भाषाई पकड़ और विषय को निभा ले जाने का आर्ट स्पष्ट समझ आ जाता है . महेंद्र जी जितने व्यंग्यकार हैं , उतने ही गजलकार भी हैं . उनका स्वयं का अध्ययन भी पर्याप्त है . अपने कई व्यंग्य लेखों में वे काव्य पंक्तियां प्रयोग करने से स्वयं को रोक नहीं पाते .उदाहरण स्वरूप “लोकतंत्र ” का समापन करते हुये वे इकबाल का शेर लिखते हैं…
“जम्हूरियत इक तर्जे हुकूमत है कि जिसमें बंदो को गिना जाता है तौला नहीं जाता ” गिनती की इस दौड़ के लिये कैसे चुने हुये जन प्रतिनिधितियों को रिसार्ट में लगभग किडनैप कर रखा जा रहा है , हम आज भी देखते हैं . इसी तरह “जायजा ” व्यंग्य में वे अकबर का ओरछा नरेश की प्रेयसी रायप्रवीण
से बहुचर्चित संवाद उधृत करते हैं जिसमें रायप्रवीण स्वयं को अकबर की हवस से बचाने के लिये कहती हैं…
” विनती राय प्रवीण की सुनिये शाह सुजान , झूठी पातर भखत हैं बारी , वायस, स्वान ”
गजलिया शायरी , नंगापन महात्म्य , इक दूजे के लिये , आदि व्यंग्य लेखों में भी काव्य पंक्तियां उधृत कर वे अपने कथ्य लक्ष्य को साधते मिलते हैं .
उनके अनेक व्यंग्य लेखों के विषय भी साहित्य जगत के इर्द गिर्द से उठाये गये हैं उदाहरण स्वरूप बिरादर व्यंग्यकार को श्रद्धांजली , साहित्यकार , शोध निदेशक , नामुराद शायरों की नामुराद शायरी , समीक्षा के विविध आयाम ,सम्मान समारोह , हास्य कवि आदि व्यंग्य लेखों के शीर्षक ही उनके कंटेंट का परिचय देते हैं . इन सबमें मुझे व्यंग्यकार की अनुभूत विडम्बनायें तैरती मिलीं . किताब पर फ्लैप टीप हरि जोशी ने लिखी है , यह उल्लेख भी रचनाओ की परिपक्वता बताने को पर्याप्त है . महात्मा गांधी का जिस तरह उपयोग या कहें कि दुरुपयोग आज के पक्ष विपक्ष के राजनेता कर रहे हैं वह सब लेखक की पैनी दृष्टि में है . ” निबंध महात्मा गांधी” संभवतः संग्रह का सबसे छोटा व्यंग्य है , पर बहुत बड़े कथ्य की सशक्त रचना है . ” आज हर गली मोहल्ले में गांधी ही गांधी हैं , जो उन्हीं की तरह खादी पहनते हैं , …. अब तो मार्गदर्शक मण्डल के नेता९ को ही अपना मार्ग नहीं सूझता …. बापू के राम ने चाहा तो लोकतंत्र के नये मानदंड स्थापित करके ही दम लेंगें . “महेंद्र जी को व्यग्य के लिये ही म प्र साहित्य अकादमी से अवार्ड मिल चुका है , आशय यह है कि उनकी कलम में दम है जिसे साहित्य समाज स्वीकार रहा है .
मैंने समकालीन और परसाई जी की पीढ़ी के ढ़ेर सारे व्यंग्य संग्रह पढ़े हैं , जो अच्छे लगे वे अब भी मेरे बुकसेल्फ में हैं . और महेंदर अग्रवाल का यह संग्रह ये मुंह और मसूर की दाल भी मैं सम्भाल कर रखने जा रहा हूं, आपको यह बताने का आशय यही है कि किताब खरीद कर पढ़े जाने लायक , पैसा वसूल है .

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