लघुकथा : सुदामा के कान्हा – श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल जबलपुर

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सकारात्मक लघुकथा

सुदामा के कान्हा

 “मां मेरे स्कूल में जन्माष्टमी के लिए फैंसी ड्रेस का आयोजन है। मैं भी कृष्ण बनूंगा।”  छोटे से रवि ने कहा। आउटहाउस में रहने वाली रेवाबाई उदास होकर चुपचाप अपने लाडले का मुंह देखती रही, कुछ कहा न गया।  सुबह मालकिन को कितने उल्लास से उनके बेटे को महंगे मुकुट, सुंदर कपड़ों, गहनों से सुसज्जित करते देखा है।        हम कहां वे कहां, मन मसोसकर रहगई।             —-“हर बार की तरह इस बार भी *अंशुल भैया प्रथम* आए हैं। हाँ, इस बार उनकी जोड़ी को *सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार* मिला है। उनके जीवंत सराहनीय अभिनय को लोग देखते रह गए।” मैडम प्रिया ने आकर बताया। उन्होंने तो सुबह ही अपने बेटे को सुंदर कृष्ण बनाकर भेजा था और ये—-यहाँ —हतप्रभ होकर देखती रहगई रेवाबाई। कैसी अनूठी प्यारी लग रही है *सुदामा कृष्ण की जोड़ी*।                      स्नेही बंटी भैया ने कब उनकी बातें सुन लीं और स्वनिर्णय लेकर उसके बेटे को कृष्ण बनाकर स्वयं सुदामा बन गए और सभी लोगों का दिल जीत लिया।   दोनों माताएं गदगद हो, निःशब्द हैं, अपने निष्कपट निश्चल भोले मन के बालकों को निहार रहीं हैं। किंकर्तव्यविमूढ़ सोच रहीं हैं ,क्या इस *आधुनिक स्वार्थी युग* में ये संभव है? क्या *बालकों के भोले मन* की थाह कोई समझ सका है? ऊंची सीख देकर नई पीढ़ी संभवतः कुछ अच्छा मनभावन करने चली है। 

 –श्रीमती अलका मधुसूदन पटेल
जबलपुर म प्र। 
       

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