काव्य भाषा : प्रीत हो तो ऐसी – व्यंजना आनंद मिथ्या ,बेतिया , बिहार

प्रीत हो तो ऐसी

कक्ष में लेटे श्री कृष्ण,
सर दर्द से कराह रहे,
द्वार पर खड़े हैं नारद,
मंद-मंद मुस्कुरा रहे ।
कहा नारद ने प्रभुवर से-
जो सबके दुःख हर्ता हैं।
हर कण के पालन कर्ता हैं ।
उन्हें कैसे दर्द छू सकता हैं ।
कृष्ण ने कहा नारद से-
सच नारद, मुझे आज बहुत दर्द है ,
क्या तुम्हारे पास इसका कोई मर्ज है ???
नाiरद पड़ गये चक्कर में,
कहा प्रभुवर- आप तो अंतर्यामी हो ।
कण – कण के स्वामी हो
आप स्वयं ही दे पीड़ा का निवारण,
आप ही तो सबके स्वामी हो।।

कृष्ण मुस्कुराते हुए कहते है–
मुझे चाहिए एक व्यक्ति ऐसा,
जो हो प्रेम से हरदम भरपूर ,
जिसके कारण ही होगी
मेरी यह भयंकर पीड़ा दूर।।
झट से बोल उठे नारद-

इस दुनिया में मैं ही हूँ
सबसे बड़ा नारायण भक्त,।
फिर किसकी है तलाश प्रभुवर
बर्बाद न करें अब अपना वक्त ।।
मेरे भीतर भरा पड़ा है- –
प्रभुवर तेरा ही प्रेम रस।
मैं तो रहता बस तेरी धुन में,
न जा पाता कहीं प्रेम वश ।।

कहा कृष्णने- अब देर न कर,
आ दे मुझे अपनी चरणधूलि।
क्योंकि यह धूलि ही है दवा मेरी,
जो पीड़ा हर लेगी मेरी पूरी ।
नारद झट पीछे हट गए,
कहा- क्यों यह अनिष्ट ।
मुझसे करवाना चाहते हो?
जो कर देगा मुझे पूरा भ्रष्ट ।।
इस पाप को लेकर मैं कहाँ रहूँगा ?
इस बोझ को कैसे हरपल सहूँगा ?
मुझसे यह न हो पाएगा ।
हर पल मन पर पाप छाएगा।।
कृष्ण ने कहा नारद से-
तुमने तो दे दी प्रेम परीक्षा!
अब तुम जाओ गोकुल में
गोपियाँ जहाँ कर रहीं मेरी प्रतिक्षा।।
नारद चल पड़े गोकुल की ओर
गोपिया उन्हें देख हो गई विभोर ।

कृष्ण का हाल जब जाना उसने
झट से देने को तैयार हो गई
अपने- अपने चरणों की धूल ।

नारद पड़ गये अचरज में
कहा- ये तुम क्या कर रहीं हो?
अपनी चरण धूलि दे कर
पाप की झोली क्यों भर रही हो?

गोपिया बोली मैं ना जानू पाप- पूण्य
और कुछ भी न जानू मैं बावरी।
हे नारद- मैं सिर्फ इतना जानू
बसी मुरत सिर्फ सावरी।।

वो मेरे प्रियतम प्यारे हैं
उनकी पीड़ा मेरी पीड़ा ,
उस पुण्य को कहाँ मैं रख पाऊंगी
पुण्य से क्या?
प्रभु पीड़ा हर पाऊंगी ।
नहीं चाहिए मुझे पुण्य
जो कर दे मेरा अनमोल प्रेम शुन्य
प्रेम दिवानी जो होतीं हैं
वो सिर्फ खोती ही खोती है।
नारद लज्जा से शरमाएँ
धूलि ले प्रभु के द्वारे आए ।।
जैसे धूली लगी माथे पर।
दर्द से वे छूटकारा पाएँ ।।
कृष्ण मुस्कराते हुए बोले,
तेरा प्रेम जग का प्रेम।
सब छलनी है माया है।
साँचा प्रेम देख गोपी का ,
प्रेम से ओतप्रोत उसकी काया है।।
अतः करना प्रेम सदा गोपी सा ,
गोपी ही अमृत धारा है।
प्रीत हो तो ऐसी ही हो ,,
प्रीत से ही बना सुंदर जग सारा है।।
*
व्यंजना आनंद (मिथ्या)
बेतिया ( बिहार )

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