काव्य भाषा : गीत ,अद्भुत दृश्य -विनोद शर्मा, गाजियाबाद

गीत

अद्भुत दृश्य

अद्भुत दृश्य है उस स्थल का,
बहती सरिता निर्झर जल |
स्वच्छ स्वछंद प्रकृति प्रांगण
बहे धार करती कल कल ||

ऊँची-नीची पर्वतश्रेणी,
वृक्षों के फैले वितान |
बनी सरोवर एक मनोहर,
अनेक पशु पक्षी मेहमान ||

सराहनीय अप्रतिम स्थल पर,
बना रहें उटज तपस्वी |
कंद मूल फल की बहुतायत,
पादप अंकुरित पल्लवी ||

उदित रवि है भोर की बेला,
विहग वृंद कलरव करते |
जल में क्रीड़ा मदमस्त मीन,
मन में ज्वार मंद उठते ||

मध्यान्ह वृक्ष की छाया से,
सूरज किरणें छन आतीं |
श्याम वर्ण मधुप कलियों पर,
रसपान उन्हें क्यों भाती ||

संध्या काल अस्त दिवाकर,
निकले जुगुनू कर प्रकाश |
स्वर ध्वनि झाँझ मजीरा की,
गूँजा सरगम ताल भास ||

प्रकृति करे मोहित जीवों को,
चंद्र कला की क्रियाएँ |
उठते हैं ज्वार जलाशय में,
गाकर जल की गाथाएँ ||

तट पर तटस्थ तब रहकर भी,
प्रतिरूप प्रसारण प्रतिभा |
सहचर ज्ञान भान कितना है,
जग जगत जननी की प्रभा ||

श्रृंगारित सौंदर्य स्वयं का,
प्रवृत्ति ये केवल प्रकृति की |
सलिल प्रवाह नदी की धारा,
बिंब अभंग न आकृति की ||

उटज बना ऐसे प्रांगण में,
श्रेयतर है कितना रहना |
एकांत वास नित तम कैसा,
तप चुनकर तन को सहना ||

© विनोद शर्मा
गाजियाबाद

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