काव्य भाषा : दोहा-दरबार – रश्मि स्थापक , इंदौर

दोहा-दरबार
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मौसम की पाती लिखे,
बादल के सब रूप।
सहमा सूरज झाँकता,
दुबक गई है धूप।।
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टूटे -टूटे मन उठी,
बिसराई सी हूक।
मौसम लाया संग में,
यादों की संदूक।।
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स्वांग नित धरते नये,
कजरे-कजरे नैन।
रूठ गये बिन बात ही,
व्याकुल मन दिन रैन।।
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नयनों ने कब सीख ली,
बादल वाली बात।
बिन मौसम बरसें सखी।
दिवस न देखें रात।।
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कच्चे धागे से जुड़ें,
मन से मन के भाग।
तोड़े से टूटे नहीं,
सच्चे ये अनुराग।।
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फितरत मौसम सी रखें,
मतलब के जो यार।
सौदागर वो प्रेम के,
करते बस व्यापार।।
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रश्मि स्थापक
इंदौर

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