लघुकथा : भागम भाग और एक तड़पता आदमी – आर के तिवारी सागर

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लघु कथा
भागम भाग और एक तड़पता आदमी

मैंने देखा सड़क पर पड़ा था एक आदमी! आदमी क्या? वह सिर्फ जिस्म का ढांचा था। राह चल रही थी आदमियों की। चल क्या रही थी! बल्कि उस वक्त उस राह पर आदमी भाग रहे थे। उस पर लोगों की नजर पड़ रही थी पर उड़ती हुई सी। उसे देख कर कोई रुक भी नहीं रहा था। मैं सोचने लगा क्या हो गया है? संवेदना जाती रही है क्या इंसान की ? क्या आत्मा मर गई है! और वह पड़ा- पड़ा कराह रहा था। लोगों से मदद के लिए पुकार रहा था, पर लगता था मानवता वास्तव में मर चुकी थी बेदर्द जमाने की।पर वहां दौड़ रहा था हर शख्स शायद अपनी रोटी की तलाश में। इसीलिए अपनी फिकर के आगे उन्हें अपने सिवा किसी और को देखने की फिकर नहीं थी।उसे देखने से लगता था शायद वह कई-कई दिनों से भूखा था, तन पर एक भी कपड़ा ना था। देखने से हड्डियों का ढांचा दिख रहा था। जिस्म पर मांस का एक टुकड़ा भी समझ न आ रहा था। *आंखें खुली थीं, मुख भी खुला हुआ था, बस सॉ॑से चल रही थीं और वह आसमां को देख रहा था।* दौड़ती हुई गाड़ियों के शोर में दब रही थी उसकी वेदना और अब बाकी ना थी आसऔर चेतना भी ।
*पर इंसानियत को भूल कर भाग रहा था आदमी*
*और मैं भी बहुत देर तक खड़ा खड़ा सोचता रहा, दर्द भी महसूस करता रहा, तड़पता भी रहा पर, “मैं भी महान ना बन सका” और मैं भी उन आदमियों की भागती भीड़ के साथ अपनी रोटी के लिए भागने लगा।*

आर के तिवारी
सागर

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