हम हिन्दी हैं – टी एस शान्ति, मदुरै, तमिल नाडु

हम हिन्दी हैं

हम अपने देश की स्वतंत्रता बाने के लिए क्या क्या करना पड़े। अंग्रेज हमें लूटने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से यहाँ व्यापार करने के बहाने आये। आहिस्तें आहिस्तें भारत में अपने पैर जमा लिये। हमारा देश जब जब अपने अपने मातृ भाषा से बात चीत कर रहे थे। हमारा देश तब छोटे मोटे राज्यों से बंटा हुआ था। इन राज्यों के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े से फायदा उठाकर अंग्रजों ने इन्हीं राजाओं को पहले गुलाम बनाया। फिर प्रजा भी इस गुलामियत में आ गयी। कर वसूलने के लिए जमीन्दारी की प्रथा ब्रिटिश सरकार द्वारा बनायी गयी। यहाँ के लोगों को रखकर हो हमें गुलाम बनाकर शासन करने लगे। इसमें लाखों का बलिदान हैं। हम अपने देश की स्वतंत्रता के लिए बहुत कुछ करना पढा।
पहले हमारा देश के लिए एक भाषा चुन्ना पडा। भारतीय राष्ट्र नायकों ने हिन्दी या मानक हिन्दी को अपनी राष्ट्र भाषा मान लिया। जन भाषा, वाणिकभाषा, संपर्क भाषा, कार्यालय भाषा, सामान्य भाषा, राजभाषा, राष्ट्रीय भाषा जैसे नामों से भी इसके महत्व को प्रचलित रुप में देखना हमारा कर्म और धर्म हैं। उत्तर भारतीय प्रमुख प्रचारकों की अमूल्य सेवाएँ किं। दक्षिण में सर्वश्री प्रतापनारायण वाजपेयी, पं ऋषिकेश शर्मा, जमुना प्रसाद, पं रामानन्द शर्मा, पं अवधनन्दन, पं रधुवरयाल मिश्र, पं वज्र नन्दन, पं देवदत विद्यार्थी, पं राममरोसे श्रीवास्तव, नागेश्वर मिश्र, रामगोपाल शर्मा, आदि ने दक्षिणों वातावरण के अनुकुल अपने आपको पूरे दक्षिणाय बनाकर वर्षां तक जो हिन्दी सेवा की, उसका मूल्य आँकना कठिन् है। दक्षिण के उन्नवराय्यादास, शिवन्न शास्त्री, पी वेंकट सुब्बाराव, स्वामी शंकरानन्द, एम के दामोदरन उण्णि, श्रीनिवास शास्त्री, पी के केशवन नायर, हरिहर शर्मा आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। उनकी देश भक्ति, भाषा, प्यार, सहायता के बिना हिन्दी की यह लंबी यात्रा संभव नहीं है। सब लोगों हिन्दी की सेवा करे और आभारी रहें।

टी एस शान्ति
मदुरै तमिल नाडु

9486207819

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