विविध : रिश्तों में साजिशें – स्वरा सुरेखा अग्रवाल लखनऊ

रिश्तों में साजिशें

साज़िशें जब शुरुआत से ही साथ चलती है तब रिश्तों पर इल्ज़ाम थोपना न्याय नही कहलाता, क्योंकि ताली एक हाथ से नही बजती, एक हद्द तक झुकना ठीक है, लेकिन अगर कोई यह कहे कि तैरना नही आता तो भी समंदर में छलांग लगा दो तो उसकी बात मान आप ख़ुद को बेवकूफ साबित करते हैं, एक पल के लिए आप उसपर विश्वास कर के कूद भी जाते हैं, तो अगला या तो अंधा बनता हैं या बहरा।
कहने का तातपर्य रिश्तों में सम्मान बराबरी का हो,छोटे स्नेह और आशीष चाहते हैं, और बड़ो का फ़र्ज़ उनको आगे बढ़ाने का,पर जब बड़ा हावी होकर हर बार माफ़ी नामा मांग अपने अहम कि संतुष्टि करे तो आँखो में आँखे डाल कर बात करना ज़रूरी।
जब दम्भ हावी होकर हुकुम चलाने लगे,आदेश में धमकी हो,औऱ गुणवत्ता के नाम पर उपेक्षित करने की कोशिश, तो तालमेल ओर संतुलन दोनो डगमगा जाते हैं।
क्योंकि बड्डपन कभी भी ग़लत होने पर माफ़ी नही मांगना चाहता वज़ह उसकी अपनी सोच और सोच के ताने बाने उलझा उसका दम्भ
बड्डपन के साथ दम्भ फिट नही बैठता, वह रिश्तों की दुहाई देता रहता है, दुसरो पर तोहमतें या वाकयुद्ध के साथ वॉर करना आसान होता है बहुत आसान,सच्चा वही जो अपनी गलतियों के साथ क्षमा मांग परिवार डूबने से बचाए, जिद्द बच्चे करते हैं, बड़ो को जिद्द शोभा नही देती, क्योंकि मुखिया घर को बचाता है, जिद्द कर अगर वह घर को तोड़ने लगें तो परिवार के सदस्य फिऱ वह बागडौर मजबूती से थाम लेते हैं।क्योंकि तब घर बचाना ज़रूरी हो जाता है, जब हम बड़े कोई काम हाथ मे लेते हैं तब बहुत चीजे सामने आती है, छोटी मोटी बहस,सदस्यो के मध्य तनाव भी,कभी क़भी बात हद्द से ज्यादा बढ़ जाती है, समझदार मुखिया वही जो अपनी ग़लती मान घर परिवार को सुरक्षित रखें, परिवार में राजनीति का काम ही नही, क्योंकि परिवार एकता का प्रतीक है और राजनीति षडयंत्र का मायाजाल।
रिश्तों को तोलने या परखने से रिश्ते आबाद नही होते, रिश्तों को पीना पड़ता है हर स्वाद के साथ खट्टे हो या मीठे नमकीन हो या कड़वे जिन्होंने चख लिए वे ताउम्र बगैर मुहँ बनाये चलते रहते हैं ताउम्र, बस अहम इसकी नाजुकता औऱ पवित्रता खत्म कर देते हैं, दोषारोपण आसान जब क़भी ऐसी स्थिति आये तो कुछ पल आईने के समक्ष ख़ुद का मुआइना ज़रूर करे क्योंकि हम हरवक्त सही नही होते, मतभेद होते हैं, होते रहेंगे,पर जब मनभेद होने लगे तो थमना बेहतर, अपने हिस्से की धूप सभी का अधिकार, चेहरे की कमी साफ दिखती है फिऱ….!

स्वरा
सुरेखा अग्रवाल
लखनऊ
उत्तरप्रदेश

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