जीवन जीने की कला सिखाती है विजया तिवारी की पुस्तक -समीक्षक : अशोक अश्रु विद्यासागर,सागर

जीवन जीने की कला सिखाती है विजया तिवारी की पुस्तक

पुस्तक का नाम: – जीवन जीने की कला
विधा: गद्य (आलेख)
लेखिका: विजया तिवारी
प्रकाशक: निखिल पब्लिशर एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स
मूल्य: 60/-
पृष्ठ: 40
समीक्षक : अशोक अश्रु विद्यासागर

पृथ्वी पर हम सभी मनुष्य जन्म लेते हैं परंतु सभी की जीवन यात्रा सफल नहीं कही जा सकती। जीने की कला के अभाव में मनुष्य पर सब कुछ होते हुए भी सुख शांति और जीवन का आनंद नहीं ले पाता क्योंकि जीवन को जीने की भी एक कला है। जो इसे जान लेता है उसका जीवन सफल ही नहीं आनंद का पर्याय बन जाता है।
जीवन जीने की कला से संबंधित मूलभूत सिध्दांतों को सहज और सरल तरीके से समझाते हुए लेखिका विजय तिवारी ने अपनी लेखनी के माध्यम से सारगर्भित पुस्तक को सृजित किया है।
जब हम आवरण पृष्ठ को पलटते हैं तो हमें श्री गणेशजी की स्तुति करता हुआ पृष्ठ मिलता है। “वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि, समप्रभ” अर्थात घुमावदार सूँड वाले जिनका विशालकाय शरीर है और जो करोड़ों सूर्यों के प्रकाश के समान दीखते हैं। यहाँ इस श्लोक की उपस्थिति यही दर्शित करती है कि बिना ईश्वर के सत्संग के हमारा जीवन सफल नहीं हो सकता है। इसलिए किसी भी कार्य का प्रारंभ करें तो ईश्वर की प्रार्थना आवश्य करें।
आगे बढ़ते हैं तो लेखिका ने अपनों से अपनी बात कही है। सत्य भी है, पुस्तक के सभी पाठक उनके अपने ही तो हैं। उनकी अब तक छह पुस्तकें आ चुकी हैं- ‘रे मन’, ‘कामधेनु’, ‘सतरंगी लघुकथाएं’, ‘मधुर स्मृतियाँ’, ‘शाकाहारी व्यंजन बनाने की विधियाँ और ‘हमारी सांस्कृतिक धरोहर’। अब हमारे सामने उनकी सातवीं पुस्तक ‘जीवन जीने की कला’ है। अगले पृष्ठ पर उन्होंने गायत्री मंत्र के साथ-साथ ईश वंदना को पृष्ठांकित किया है। जो आर्य समाज मंदिरों में प्रातः वेला में नित्य गाई जाती है।
उन्होंने अपने आलेख ‘जीवन जीने की कला’ का प्रारंभ तुलसीदास जी की चौपाई से किया है। आपके पूरे लेख का सार है कि जीवन जीने की कला को सीखना और सीखकर अपने जीवन को सफल बनाना अपने ही हाथ में होता है। जो व्यक्ति भाग्य भरोसे बैठा रहता है। वह अपने जीवन का सही तरह से आनंद नहीं ले पाता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने से कोसों मील दूर रहता है। या यूँ कहें कि वह सफलता प्राप्त करने में असमर्थ रहता है।
लेखिका ने अपनी बात स्वाध्याय, सेवा और संयम से प्रारंभ करते हुए इन्द्रियों की बात की है। साथ-साथ वह अपने पाठक से योग की आठों क्रियाओं की चर्चा करती हुई दीखतीं हैं। आप यह भी बताती है कि दिव्यगुणों को धारण किये बिना मनुष्य जीवन का आनंद नहीं ले सकता। उन्होंने अपने आलेख की इति भी तुलसीदास जी की चौपाई से की है। अंत के चार पृष्ठों में महामृत्युंजय मंत्र, शांति पाठ के संग-संग रुद्राष्टकम को वर्णित किया है।
इस पुस्तक का उद्देश्य पाठक की सोच और उसके जीवन को सार्थक एवं पीड़ा रहित बनाना है। पुस्तक के हर पृष्ठ में मानव जीवन को सफल एवं उद्देश्यपूर्ण बनाने के मंत्र छिपे हुए हैं। उनका कहना है कि अपने वर्तमान क्षण पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करें जिससे मन सत्य-सार की ओर उन्मुख हो।
अंत में इतना ही कहूँगा कि लेखिका विजया तिवारी की यह पुस्तक ‘ *जीवन जीने की कला* ‘ मानव जीवन के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ पठनीय एवं संग्रहणीय है। मैं अपनी बात की इति निम्न दोहे से करता हूँ:-
जीवन जीने की कला, मन से मन की बात।
सहज सरल सत्संग की, पृष्ठ पृष्ठ सौगात ।।

अशोक अश्रु विद्यासागर
संपादक:संस्थान संगम पत्रिका
आगरा

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