सबक जिंदगी के : अपनों को अकेला ना छोड़ें – डॉ.सुजाता मिश्र,सागर

सबक जिंदगी के – डॉ.सुजाता मिश्र

अपनों को अकेला ना छोड़ें

क्या आपनें कभी कल्पना की है कि अपने बच्चों, अपने परिवार के सान्निध्य और प्रेम को तरसते हुए हमारे ही अपने बुजुर्ग, अपने परिजन यहां दोस्त भी कई बार अकेलेपन से उपजी मानसिक बिमारियों का शिकार हो जाते हैं। “एम्पटीनेस सिंड्रोम”- अवसाद की एक ऐसी स्तिथि जिसमें व्यक्ति के मन – मस्तिष्क में भीतर तक एक खालीपन सा छा जाता है कि जैसे अब न किसी को उसकी जरुरत है, न किसी के पास उसके लिये वक्त है और न उसको खुद सूझता कि वो क्या करे, किसके लिये करे और क्यों करे? ऐसा व्यक्ति कभी – कभी क्यों जिये और किसके लिये जिये वाली मनोस्थिति में भी पहुंच जाता है, जिसका अगला पडाव अकसर आत्मघाती होता है।

मुख्य रूप से अवसाद की इस अवस्था की शिकार महिलाये होती है , हालांकि कुछ मामलों में पुरुष भी हो जाते है। विशेषकर ऐसी माएं या पत्नियां जो अपने बच्चों, परिवार से भावनात्मक रूप में बहुत गहराई से जुडी हों , उनकी छोटी – बड़ी जरूरतों को पूरा करना ही जो अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य बना लेती है , अपने जीवन की तमाम गतिविधियाँ बच्चों की, परिवार की आवश्यकतानुसार निर्धारित करती हैं , यहाँ तक कि अपना खान – पान, जीवनशैली और इच्छाओं तक को बच्चों के लिये ,पति या परिवार अनुसार बदल लेती हैं, छोड देती हैं, या बिसरा देती हैं।
लेकिन जीवन सदा एक सा नहीं रहता। करियर की रफ़्तार में जब वही बच्चे बड़े होकर घर या देश से दूर कहीं पढने , नौकरी करने चले जाते हैं, या विवाह करके कहीं अन्य जगह बस जाते है और घर खाली, वीरान सा हो जाता हैं। स्थिति तब और भी विकट होती है जब बच्चे और परिवार साथ होकर भी दूर हो, यानि वो संतानें जो माता – पिता के पास रहकर भी उनकी परवाह न करते हो। क्योंकि माता – पिता के अतिरिक्त प्रेम ने उन्हें इतना आत्मकेंद्रित बना दिया होता है कि बडे होकर भी वो सिर्फ और सिर्फ खुद के विषय में सोचते हैं। ऐसे में अभिभावकों विशेषकर माँ के रोज़मर्रा के जीवन में अचानक एक बड़ी तब्दीली हो जाती है , जो भले ही दूसरे लोगों के लिए एक सामान्य सा परिवर्तन हो सकता है , लेकिन एक ऐसे अभिभावक के लिए जिसकी जिंदगी अपने परिवार और बच्चों के इर्द – गिर्द ही बुनी हो उनके लिए इसे स्वीकार कर पाना सहज नहीं होता कि जितनी जरुरत उन्हें अपने बच्चों की है उतनी जरुरत उनके बच्चों को उनकी नहीं। उसे एकदम से अपने जीवन में एक खालीपन का एहसास होता है , जैसे अब कुछ करने को ही ना हो , और कई बार यह अवसाद इस हद तक बढ़ जाता है कि व्यक्ति अपने अस्तित्व को ही नकार देता है। विशेषकर महिलाये जो जीवन में मासिक चक्र के अंतिम पड़ाव में होती है उन पर इस तरह की नकारात्मकता हावी होने की संभावना ज्यादा होती है , फिर भले ही वह महिला अपने निजी जिंदगी से लेकर करियर में कितनी ही कामयाब , प्रसिद्ध क्यों ना रही हो ,लेकिन किसी अपने से इस तरह या किसी अन्य रूप (मृत्यु , बिछोह, अलगाव ) में अलग हो जाने से कई महिलाये इस मानसिक अवसाद “एम्पटिनेस सिंड्रोम” की शिकार हो जाती हैं। देखने में ऐसा इंसान बिल्कुल स्वस्थ लग सकता है , लेकिन उसकी दिनचर्या सामान्य नहीं रहती , एकांत में बैठकर रोना या सोना यही उसकी दिनचर्या बन जाती है। ऐसे में कुछ समय तो लोग ऐसे व्यक्ति को समझाते है , मदद करते हैं पर फिर लोग उन्हें नाटकबाज़ , या गैरजिम्मेवार समझ कर उनके हाल पर छोड़ देते हैं , क्योंकि आजकल लोगों के लिए अपनी निजी उपलब्धियां, निजी जिंदगी इस कदर मायने रखती है कि उनके अंदर की तमाम भावुकता और संवेदनशीलता सूख जाती है। फिर भी कुछ लोग है जो तमाम नकारात्मकताओं के बावजूद अपने जीवनसाथी या अपने अभिभावकों के साथ खड़े रहते है आखिरी दम तक।
अत: अपने अभिभावकों के साथ, अपने जीवनसाथी के साथ समय बिताइए, चाहे आप कितने ही व्यस्त हो । बात करने का मतलब हमेशा बोलना या जवाब देना नहीं होता , एक उम्र के बाद लोग सिर्फ इसलिए बात करते है कि कोई अपना उन्हें सुने। सबसे अहम् बात अपने अभिभावकों को जज करना बंद कर दीजिये, उन्होंने आपको क्या दिया , आपके लिये क्या किया , क्या नहीं किया , ऐसी बातों को लेकर अपने अभिभावकों पर प्रश्न उठाने से अतीत तो कभी बदलेगा नहीं , हालांकि आपके जो अभिभावक 30 – 35 वर्ष अधिक जीने वाले हो , हो सकता है वो बस 10 साल ही जी पाये … मुझे तो ऐसे बच्चे ही गैरजिम्मेवार लगते हैं जो अपने जीवन की तमाम विसंगतियों का ठीकरा अपने अभिभावकों के सिर पर फोड़ते है , उनके लिए यह एक आसान उपाय होता है जवाबदेही से बचने का …. अभिभावकों को भी स्वयं को परिस्थितिनुसार ढालना चाहिए , कोई फिटनेस क्लब ज्वाइन कीजिये, योगा – मेडिटेशन कीजिये , किटी पार्टी , या कीर्तन मंडली, या साहित्यिक गतिविधियां , या दुनियाँ ही घूमने निकल जाइये , अपनी रूचि और अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप खुद को व्यस्त कीजिये। मृत्यु तो अपने समय पर ही आएगी , यूँ मृत्यु का इंतज़ार करने से यदि जीवन आसान हो जाता तो पूरी दुनिया वही रास्ता अपना लेती … अपने वो सपने पूरे कीजिये जो बच्चो को पालने – पोसने के चक्कर में आप भूल गए … बच्चे जीवन में आगे बढे आखिर इसी में तो अभिभावकों की कामयाबी है , अतः अपनी भावुक , समर्पित परवरिश को अपना ही दुश्मन मत बनाइये … मैं सलाम करती हूँ ऐसे सभी अभिभावकों को जो जीवन के तमाम उतार – चढावों बावजूद अपने लिए जीने की नयी वजह तलाश लेते है … कोई उनके साथ दे या ना दे पर वो ज़िंदादिली से जिंदगी को जीते हैं … वो भी एक ऐसे असंवेदनशील परिवेश में जहां लोग आपको उम्र के अनुसार ढल जानें को प्रतिपल विवश करते हैं, कि कोई 60 पार का व्यक्ति ज्यादा प्रसन्न दिखे तो भी उसका मजाक बनाते हैं।
हाँ फ्रेंडशिप डे , वैलेंटाईन डे आदि मनाइये पर अपनी खुशियों में अपने अभिभावकों को भी शामिल कीजिये … क्योंकि वक़्त बीत जाने पर पछतावे के सिवा कुछ नहीं रहता … जैसे बच्चों की जिंदगी में उनके माँ – बाप की जगह कोई नहीं ले सकता वैसे ही माँ – बाप की जिंदगी में भी उनके बच्चों की जगह कोई नहीं ले सकता। उन्हें अकेला मत छोडिए ।

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