काव्य भाषा : मित्रता – कुन्ना चौधरी जयपुर

मित्रता

मित्रता का भी अपना अजीब उसूल होता है ,
ख़ुद को भूल इन्सान इसे दूसरों में खोजता है ….
मित्रता के लिये अपने दुश्मन हो जाते हैं जब कि ,
जीवन यात्रा में ख़ुद का ज्ञान ही मित्र बन राह दिखाता है

सहपाठी हो या सहकर्मी मिलते बिछड़ते हैं कई ,
गठबंधन का हमसफ़र मित्र बन ताउम्र साथ निभाता है
वक़्त कर देता जब तन मन को रोगी या निढाल,
चिकित्सक की औषधि में ही मित्र नज़र आता है

खाना,घूमना और मौजमस्ती को दे दिया है मित्रता का नाम
पर हमारे आचरण और चरित्र से सगा कोई मित्र नहीं होता है
इन्सान और जानवर जाने जाते अपने व्यवहारों से ,
धर्म परायण आचरण मरणोपरान्त भी मित्र बन साथ जाता है

रंग-रूप, स्तर, देश या जाति से न तोलें मित्रता को
दिल को जो अपना सा लगे वही मित्र बन जाता है
अभाव और प्रभाव में बनी मित्रता अक्सर नहीं टिकती
पर स्वभाव में नेकी हो तो मित्र ख़ुदा सा हो जाता है

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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