समीक्षा : डॉ चंचला दवे के काव्य संग्रह ‘हां मैं ऐसी ही हूं’ में आशावाद और आत्म गौरव से प्रतिबिंबित कविताएं हैं -डॉ गौतम पटेल,वेद ,अहमदाबाद

समीक्षा :

डॉ चंचला दवे के काव्य संग्रह ‘हां मैं ऐसी ही हूं’ में आशावाद और आत्म गौरव से प्रतिबिंबित कविताएं हैं -डॉ गौतम पटेल,वेद ,अहमदाबाद

डॉ चंचला दवे का काव्य संग्रह मिला जिसे पूरी रात बैठकर मैने पढा। आनंद आ गया।*हां मैं ऐसी ही हूं*आप ऐसी ही रहे,मेरी शुभकामना है।
संग्रह के कुछ अंश पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा हूँ,देखिये –
पृ 17 संकलन की कविता “होना तो चाहिए आग मुझे,पर पानी ही रह गई”अच्छा हुआ आग बनती तो जलाती, पानी रही तो प्यास बुझाती हो। धन्य हैं
पृ-17 अपने को राजरानी समझती,कवि की द्दष्टि शत प्रतिशत पूर्ण है,आप राजरानी ही है। चंचला दवे का कितना भव्य आदर्श है।
पृ-18 दूसरो की टेढी बात का सीधा अर्थ खोजने वाली/बहुत पाने की चाह आज भी नहीं है-फिर भी अपने श्रम से आपने अत्याधिक प्राप्त किया है.चंचला की कविता छोटी जरुर है,पर बडी बात कहने में समर्थ है.
प्रश्न एक कृष्ण से-कविता में “सम्हालो गोपियों के प्राणेश-यहां मै अपनी ओर से एक पंक्ति जोडने की धृष्टता करता हूं.
मै भी एक गोपी हूं
आपकी मुकदमा कविता अद्भुत है.
नीरस से जीवन में प्रीत के रंग तुम भरना–इस पंक्ति में सर्वांग समर्पण से मै अभिभूत हूं.कविता में अपने कर्मभूमि सागर के प्रति प्रेम छलकाती यह लाइन/मेरे सागर में पवन पावन बहता रहे पृ-31-आप शुध्द जल है फिर यह बहता ही रहेगा।
पृ 40-एक बेहतर जीवन के लिए लगातार लडती है लड़कियां “प्रतीत होता है यह स्वयं कवयित्री की स्वानुभूति है। प्यार लुटाना प्यार पाना, इससे बड़ा कोई आदर्श हो सकता है क्या?
पृ-46-बदल रहा है जग ओर बदल रही हो तुम,इन पंक्तियों में चंचला ने विश्व सम्मत सिध्दांत अपनी वाचा प्रदान की है।
पृ-48-49″तुम मात्र औरत नहीं हो”इस पंक्ति में स्वयं कवयित्री का आत्म गौरव प्रतिबिंबित है। धन्य है।
वामा/कविता पृ-50-51 तुम रामायण की सीता, कृष्ण की गीता, रचनाकार की भव्य कल्पना दिखाई देती है।
पृ-60 तब मेरी भावनाओं का स्पंदन झंकृत हो,कवि की भावनाएं निःसंदेह झंकृत हो कर कविता बन कर हमारे सामने उपस्थित हैं।
पृ70- कोरोना आयेगा तो जायेगा जरूर/इस रचना में कवि का प्रबलतर आशावाद प्रतिबिंबित हुआ है।
मुझे शेक्सपियर की पंक्ति याद आ रही है-
If winter comes is the spring far behind.
पृ-74-75 खत संकलन की सबसे लंबी कविता है, पुल्लिंग में है”कामिनी पुरुषायतै, जैसी दशा है।
पृ-80 “प्रकृति के डाकिए “आधुनिक कविता में नूतन कल्पना समावेशित है।
पृ-90मे मेरी शुभेच्छा है चंचला दवे के हृदय की समष्टिगत शुभकामनाओं का दर्पण है।
स्मृति शेष-रचना पृ94-95 का वाचन करते करते मेरी आंखों से आंसु गिरने लगे,मुझे मेरी स्व पत्नि नीलम की स्मृति हो आई।आज वह स्मृति शेष है।
पृ98-99 का आरंभ हृदय स्पर्शी,अंत मस्तिष्क स्पर्शी है।
उत्तरायण कविता प्रशंसनीय है। स्वतंत्रता के फूल पर अखंडता के फल लगे, यह कल्पना सर्वोत्तम है।
आपका अस्तित्व अभूतपूर्व रूप से बना है, कवयित्री का काव्य गंगा के प्रवाह की तरह नित्य बहता रहे,और उसमें अवगाहन करने वाले मेरे जैसे अनेक ब्रम्हानंद ,सरोद आनंद प्राप्त करते रहे।ऐसी शुभकामनाएं।
अंत में तुम जैसी हो वैसी ही बनी रहो। प्रभु से प्रार्थना है।

डॉ गौतम पटेल,वेद
ज्ञानी,संस्कृत मनीषी,विद्यावाचस्पति
अहमदाबाद (गुजरात)

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