संस्मरण : पिताजी की याद में – डॉ सुषमा वीरेंद्र खरे सिहोरा जबलपुर

संस्मरण

पिताजी की याद में

बात उस समय की है जब मैं कक्षा 6 में पढ़ती थी उम्र यही कोई 10,11की रही होगी ,मैं पांच भाईबहनों में दूसरे नंबर पर थी और स्वभाव से बहुत ही उद्दंड ,ऐसे में हमेशा पिताजी के कोप का भाजन बनती रहती थी पिताजी की नजर हमेशा मेरे ऊपर टेढ़ी ही रहती थी ।मैं भी पिताजी से कोई फान नहीं करती थी जो काम होता तो मां से कहलवा ती थी । पर एक बार की बात है मैने पांचवी की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर ली थी और मुझे स्कॉलर मिलना थी ,जिसके लिए तत्काल आयप्रमाण पत्र की जरूरत थी पर पिताजी तो सरकारी काम से 15 दिन के लिए बाहर गए हुए थे अब आयप्रमाण कैसे बने कौन बनवाए ,और इधर कक्षा शिक्षिका जी ने केवल एक दिन का समय दिया ,उससमय तो फोन भी नहीं थे कि पिताजी से बात करके पूंछ सकती कि क्या करूं ।,डर भी लग रहा था कि बिना पूंछे कुछ करूंगी तो बहुत डांट पढ़ सकती है ।पर स्कॉलर पाने का मोह भी था अतः बहुत सोचने के बाद मैं अकेले ही तहसील कार्यालय पहुंच गई ,उस समय इस तरह कचहरी जाना आसान नहीं था वो भी एक 11साल की बच्ची को , बहुत हिम्मतकर तहसीलदार साहब से अनुमति लेकर अंदर गई वे भी मुझे यूं अकेला देखकर अचंभित थे ,मैं भी सहमी थी ।मुझे भयभीत देख उन्होने बडे प्यार से आने का कारण पूंछा और बैठने को कहा मैं पास ही बैंकर बैठ गई जैसे ही मैने अपने पिताजी का नाम बताकर उनका आयप्रमाण पत्र बनवाने की बात कही तो तहसीलदार साहब पिताजी का नाम सुनकर ही चहक उठे और बोले अरे बेटा तुम श्रीवास्तव जी की बेटी हो ,अभी तुम्हारा काम हो जाएगा ।ऐसा कहकर उन्होने कागज पर कुछ लिखा और अपनी शीललगाकर मुझे देते हुए बोले जाओ बेटा काम हो गया ।मैं खुशी से दौड़ती सीधे स्कूल पहुंची और कक्षाशिक्षिका जी को आयप्रमाण पत्र दे दिया । पर अब डर तो ये सता रहा था कि पिताजी जब सुनेंगे कि मैं अकेली कचहरी गई थी तो पता नहीं क्या होगा ,इसबार तो पिटाई होने की पूरी संभावना थी मुझे ।
इंतजार खत्म हुआ पिताजी आ गए ।
उनको आया जान मैं कमरे में दुबकी बैठी रही ।पिताजी सबको बुलाते थे अपने पास बाहर से आने पर ,उसदिन भी सब भाई-बहन उनके पास पहुंच गए मुझे न देख पिताजी ने आवाज लगाई तो डरती डरती उनके सामने आई ,मुझे लग रहा था कि तहसीलदार जी ने बता ही दिया होगा मेरे बारे में तो अब मेरा हाल बहुत बुरा होने वाला है ,पर मुझे देखते ही पिताजी ने झपटकर गले से लगा लिया और सबको बड़ी खुशी से मेरे  कचहरी जाने की बात बताने लगे ,उनको इतना खुश देखकर और मुझे प्यार करते देख विश्वास नहीं कर पा रही थी मैं कि पिताजी मुझे प्यार भी करते हैं ।पिताजी का यह रूप मेरे लिए बिल्कुल नया था ।
और उस दिन के बाद से पिताजी हमेशा यही कहते थे कि मेरी ये बेटी कर्मठ व उत्कृष्ट है ।
पिताजी को देवलोक सिधारे 20 साल हो गए पर  यह यादगार पल आज भी ताजा हो जाते हैं ।

डॉ सुषमा वीरेंद्र खरे
सिहोराजबलपुर मध्यप्रदेश

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