काव्य भाषा : मेरी टूटी – फूटी नाव -अमृता अग्रवाल, नेपाल

मेरी टूटी – फूटी नाव

जानती हूं मैं….!
मेरी चेतना की नाव टूटी – फूटी है,
जिसे मैंने परम अनंत सागर में उतारा है।
मगर कोई तो है!
जोड़ने और तोड़ने वाला,
बनाने और मिटाने वाला,
उसे समर्पित कर खुद की डोर….
खुद को भव सागर में उतारा है।

उलझन सुलझा दे,
या मुझे खुद में उलझा ले,
बस एक तेरा ही तो सहारा है।
जो तेरी मर्ज़ी,
वो अब मेरी भी मर्ज़ी…..
मैंने अपने होंठो पर,
तेरी इबादत का स्वाद उतारा है।

मेरे लिए तू दूर है,
लेकिन तेरे लिए मैं दूर कहां?
होगी मेरी अनजान डगर!
मगर तूने तो सारा ब्रह्मांड संभाला है।
मिटा दे अब मेरी सारी भ्रांतियां,
हर वो दुखद स्वप्न जो,
मेरी श्वांसो को विकल करती हो…
तेरी एक नज़र ही मुझ पर,
मेरी जीत की विजय पताका है।

जानती हूं मैं…..
मेरी चेतना की नाव टूटी – फूटी है,
और मेरी पतवार को तूने संभाला है।
डूब के भी नहीं डूब सकती मैं…..
क्यूंकि सागर भी तू और सहारा भी तू है,
और अगर डूब भी गई तो क्या?
तेरे अंतर सागर के….
दिव्य संस्पर्श में मेरा ठिकाना है।

अमृता अग्रवाल
नेपाल(जिला : सर्लाही)
अंचल: जनकपुर धाम

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