काव्य भाषा : मानवता – डॉ सुषमावीरेंद्र खरे सिहोरा जबलपुर

मानवता

जाने कहां खो गई है आज हम इंसानों की मानवता ।

राग द्वेष में लिपटकर विलुप्त हो रही है मानवता ।
पल में सर कलम करने में न कोई झिझकता है यहां ,
मानव के मानसपटल पर छा रही है देखो आज दानवता ।।

करते पशुओं सा व्यवहार न रखते भाव दया का कोई यहां
धर्म और जाति के नाम पर झंडा गाड़ते सब यहां
इंसानियत का भाव तो दिखता नहीं दिल में किसी के ,
बस मानव तन के नाम पर शेष रह गई है मानवता यहां ।।

कैसे गरीब की गर्दन को काट डाला बेरहम जल्लाद ने
न सोचा न समझा उसके परिवार के लोगों के दुख के बारे में
पीछे बिलखते है बालक उसके और पत्नी तड़पती है ,
ये क्या कर डाला जालिम तुमने खोये हो कहां कैसे उन्माद में ।।

डॉ सुषमावीरेंद्र खरे
सिहोरा जबलपुर मध्यप्रदेश

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