काव्य भाषा : रथयात्रा – राजेश तिवारी ‘मक्खन’ झांसी

रथयात्रा

जय जय जगन्नाथ भगवान ।
जय जय जगन्नाथ भगवान ।।
पावन पुरी पवित्र धाम में विराजें कृपा निधान ।।

विराजे है बलभद्र दाऊ जी और संग सुभद्रा बहना ।
ए शोभा के सिन्धु शिरोमणि यही कवि का कहना ।।
केवल पुरी उड़ीसा का नही करत जगत कल्यान ।
जय जय

रथ यात्रा है प्रसिद्ध जगत में जुड़ते नर और नारी ।
जनसम्मर्द सम्पूर्ण नगर में जुड़ी भीड़ अति भारी ।।
भक्त हृदय से कीर्तन करते होता उत्सव अति महान ।
जय जय

दारू से निर्मित है मूरत शिल्प विश्वकर्मा दई बनाई ।
निर्मल उज्ज्वल धवल कीर्ति शुभ सुकवियों ने गाई ।।
करत दण्डवत परिक्रमा कर प्रभु धरते उर में ध्यान ।
जय जय

भोग प्रसाद काष्ट अग्नि पर पहले ऊपर का घट पकता ।
जगन्नाथ का भात प्रसादी प्रेम से पाते है सब भकता ।।
दूर दूर से आये भक्त जन प्रेम से करत सिन्धु स्नान ।
जय जय

चार धाम में धाम एक यह यहां श्री गोवर्धन मठ है ।
हरे कृष्णा का करो कीर्तन सो भव बंधन भी कट है ।।
जय सर्वेश्वर जगन्नाथ जय जय जय कृपानिधान ।
जय जय

कलयुग में अति कीर्ति आपकी कृपा कृपानिधि करते ।
पाते है सालोक्य मुक्ति नर यहाँ अनायास आ मरते ।।
शरणागति अति सरल हृदय से तो अपनाते भगवान ।
जय जय

फहराता विपरीत हवा ध्वज चक्र प्रत्यक्ष सा दिखता ।
मंदिर शिखर से कभी कोई भी खग भी नही निकषता ।।
छाया प्रति छाया कोई कभी नही यहाँ मिलत निसान ।
जय जय

राजेश तिवारी ‘मक्खन’
झांसी उ प्र

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