कोरोना काल की भयावहता पर एक यथार्थ परक उपन्यास पर चर्चा संगोष्ठी

कोरोना काल की भयावहता पर एक यथार्थ परक उपन्यास पर चर्चा संगोष्ठी

इंदौर।
“कोरोना काल की खबरों का दृश्य कोलाज, प्रशासन, पत्रकारिता, शैक्षणिक विमर्श, चिकित्सा आदि से संबद्ध पात्रों के नियोजन से संपूर्ण काल को दृश्यांकित करने का कथा विन्यास, कोरोना काल की भयावहता और कोरोनावायरस से ग्रस्त लोगों का यथार्थ, कोरोना संकट में सरकारी प्रबन्धन की अपर्याप्त सुविधाएं और निजी अस्पतालों की लूट, आपदा को लाभ का अवसर बनाने के हथकंडे। कोरोना के वैश्विक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। विमर्श की कमी परिलक्षित होती है। आजाद नगर को केंद्र बनाकर उसे स्थानीयता से अधिक पोषित किया गया है। अलग अलग दिशाओं के चार पात्र आजाद नगर के कथानक को रचते हैं। पर यह आजादनगर भारत में कोरोना काल का कोलाज बन जाता है। यह समय ही नायक हैं कथा का। सहज भाषा और दृश्यांकन में ही कथा की सक्रियता सामने आती है।” उपरोक्त विचार सारस्वत अतिथि वरिष्ठ समालोचक श्री बी एल आच्छा के द्वारा नगर की साहित्यिक संस्था *क्षितिज* के द्वारा आयोजित श्री अश्विनी कुमार दुबे के उपन्यास “ *समय जो भुलाए नहीं भूलता”* पर चर्चा संगोष्टी में व्यक्त किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री सूर्यकांत नागर ने कहा कि,” स्वार्थ संवेदना के मार्ग की बड़ी बाधा है। कोरोना मनुष्य जीवन का सर्वाधिक निर्मम संक्रमण काल था। इस विश्वव्यापी रोग ने अनेक सवाल खड़े किए। भूखमरी, बेरोजगारी, पलायन के अलावा भय, आशंका, तनाव, अवसा। असमंजस और अकेलेपन ने मनुष्य को मानसिक रोगी बना दिया। मनुष्यता ही कैद होकर रह गई। स्वार्थ ने किस प्रकार संवेदना पर हावी होकर मनुष्य को हृदयहीन बना दिया था, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें इस महारोग के दौरान देखने को मिला। हमने जीवित ही नहीं, मृत से भी दूरी बना ली।”

वरिष्ठ साहित्यकार श्री महेश दुबे ने उपन्यास पर चर्चा करते हुए अपने वक्तव्य में कहा ,”बीता हुआ समय भले ही लौट कर न आता हो, पर यही बात कोरोना काल के बारे में नहीं कही जा सकती। हम सब कोरोना की दूसरी लहर के पश्चात अब इसके नए वैरिएंट ओमीक्रॉन के आने की आहटों की दहशत के बीच जीने को विवश हैं। दार्शनिक रामिन जहानबेगलू ने कोरोना काल में प्रकाशित अपनी पुस्तक – द करेज टू एक्सिस्ट : ए फिलॉसोफी ऑफ़ लाइफ एंड डेथ के प्रारम्भ में ही कहा है – “टू बी वाइज इज टू सी द क्रुएल्टी ऑफ़ फेट बट आल्सो टू बी ऐबल टू सरप्राइज इट”। अश्विनीकुमार दुबे का नया उपन्यास “समय जो भुलाए नहीं भूलता” इसी विवेक दृष्टि को लेकर लिखा गया है। उपन्यास कोरोना काल की घटनाओं का प्रामाणिक दस्तावेज तो है ही साथ ही इससे लड़ने के मानवीय प्रयासों का लेखा-जोखा भी है। दूसरों के प्रति करुणा और स्नेह का सन्देश लिए इस उपन्यास में यह भी बताने का प्रयास करता है कि अच्छाई एक ऐसा निवेश है जो कभी निराश नहीं करती। चार मित्रों की गतिविधियों के माध्यम से उपन्यास के संरचनात्मक विन्यास को विस्तार दिया गया है। उपन्यास की अंतिम पंक्तियों में केंद्रीय मर्म अभिव्यक्त हुआ है – इस कठिन समय से एक बेहतर दुनिया बनाने की राह निकलकर आती है। ईश्वर करे ऐसा ही हो। ”

वरिष्ठ साहित्यकार और समीक्षक श्री सतीश राठी ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा कि,” श्री अश्विनी कुमार दुबे का उपन्यास “समय जो भुलाए नहीं भूलता” कोरोना के कालखंड के एक निर्मम दस्तावेज के रूप में सामने आया है। सारे विश्व पर एक विभीषिका के रूप में कोरोना कालखंड निकला है और अभी भी इसका प्रकोप थमा नहीं है। जिन स्थितियों में उस वक्त सामाजिक सरोकार समाप्त हो गए थे और व्यक्ति भय की स्थितियों में जी रहा था, उस कालखंड में कोरोना के सामाजिक प्रभावों को चित्रित करने वाला यह उपन्यास एक रिपोर्ताज के रूप में सामने आया है।”
कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों के स्वागत के साथ लेखक के द्वारा अपनी रचना प्रक्रिया पर एक वक्तव्य प्रस्तुत किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का संचालन लेखिका अदिति सिंह भदोरिया के द्वारा किया गया और संस्था के सचिव श्री दीपक गिरकर के द्वारा अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here