व्यंग्य : व्हाट्सएप के तीरंदाज – आर के तिवारी , सागर

व्यंग्य :
व्हाट्सएप के तीरंदाज

यार रामलाल ग्रुप में आज एक पोस्ट देखने को मिली उसका शीर्षक था *विश्व स्वास्थ्य दिवस की शुभकामनाएं*। मैंने देखा उसके नीचे एक लंबी लिस्ट थी जिसमें हिदायतें दी गई थीं – बीपी कितना रहना चाहिए, पल्स कितनी होनी चाहिए, कोलेस्ट्रॉल कितना रहना चाहिए, हीमोग्लोबिन कितना रहना चाहिए महिलाओं में कितना पुरुषों में कितना। तमाम स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी थी। लिस्ट बहुत लंबी थी, मैं विस्तार में नहीं जाना चाहता। मेरी बात सुनकर रामलाल बोले भैया आजकल अपने ही ग्रुप में नहीं कई ग्रुपों में इस तरह की पोस्टें आती रहती हैं । जिसमें कई तरह के स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे भी बतलाए जाते हैं, कई तरह के योगा के कार्यक्रम भी आते हैं जिनका पता भी नहीं रहता कि वे विशेषज्ञ हैं या रोड छाप तो यहां-वहां से धर्म संबंधी और धार्मिक,राजनीतिक *”आग लगाने वाली”* पोस्टें आया करती हैं। *और एक बात* बहुत मजेदार है एक ही पोस्ट यहां-वहां से फारवर्ड होती हुई *कई ग्रुपों में से होती हुई* उसी व्यक्ति तक आ जाती है जिस व्यक्ति ने सर्वप्रथम उसको भेजने का *श्रीगणेश* किया होता है। अब समझने वाली बात उसे हो जाती है कि वह कहता है *”अरे यह तो मेरी पोस्ट थी फलां व्यक्ति ने भेज दी” ! इसके अलावा कुछ लेख-आलेख, कुछ यहां-वहां की कविताएं तोड़-मरोड़ कर अपना नाम देकर लोग पोस्ट कर रहे हैं ।अब उन पोस्टों में भी आपत्ति कोई नहीं उठा पाता क्योंकि, कोई कॉपीराइट तो होता नहीं और किसी की पोस्ट को कोई यहां-वहां से शब्दों को ऊपर- नीचे करते हुए अपनी पोस्ट बना देता है। अरे भाई शब्द तो हिंदी के ही हैं या मिली-जुली उर्दू के होंगे इस पर किसी का बस भी नहीं “तो” यह तमाम बातें चल रहीं हैं। सब अपने- अपने मजे ले रहे हैं, स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी बने हुए हैं। असल में सबको मशहूर होने का एक चांस व्हाट्सएप ने दिया है तो लोग ख्याति हासिल करने के लिए अपने फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं ।*
किसी को रोका भी तो नहीं जा सकता। सब *अपने मन के राजा* हैं और आपने देखा होगा कुछ “हंसी ठिठोली” की पोस्टें *वे भी तरह तरह की तस्वीरों के साथ उन्होंने भी आजकल अपना जलवा* इन समूहों में बिखेर रखा है और जिन्हें हम किसी के नंबर से उस पोस्ट को उठाकर समूह में डालकर अपने आपको बहुत *बड़ा तीरंदाज* समझने लगते हैं और अपने आप को बहुत गौरवान्वित महसूस करते हुए सोचते हैं की समाज के लिए मैंने बहुत बड़ा *योगदान* कर दिया। और तो और, आजकल मदर्स डे, फादर्स डे, फ्रेंड्स डे, नशा मुक्ति डे और भी ना जाने कितने प्रकार के डे मनाए जा रहे हैं और इसमें भी लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और *फिर वही बात कि वही एक पोस्ट कई जगहों से होते हुए वापस उसी के पास पहुंच जाए*
पंडित जी, मैं कई ग्रुपों से जुड़ा हुआ हूं इसलिए मुझे इस सब की जानकारी है।‌ यदि आप भी कई ग्रुपों से जुड़े होते तो *अपना सर पकड़ लेते*। लोग दूसरों को इतनी शिक्षाएं देते हैं कि पूछो मत ! “चाहे खुद उस पर अमल बिल्कुल नहीं करते”। अच्छे परिवार का बखान करेंगे,अच्छी मित्रता का बखान करेंगे, मां के ऊपर बड़ी-बड़ी कविताएं लिखेंगे, पिता के आदर्श का बखान करेंगे, उनकी सेवा करने के लिए वकालत करेंगे। *यह बात अलग है कि वह अपने घर में सेवा करते हैं या नहीं करते , पर बखान जरूर करते हैं*।
इस तरह मैं देख रहा हूं काफी दिनों से जिनको कोई नहीं जानता था आज उनको सब जानने लगे हैं।‌”यहां उनकी बहुत ख्याति हो गई है”। यह बात अलग है कि बुरे मन से उन पोस्टों को लोगों द्वारा देखा जाए ! “अब देखना भी पड़ता है” क्योंकि सामने वाले ने बड़ी वजनदारी से उस पोस्ट को मेरे व्हाट्सएप पर भेजा है,वह वहां बैठा हुआ इंतजार करता है कि मैंने देखी कि नहीं देखी, कोई रिप्लाई दे रहा हूं या नहीं! तो भैया मजबूरी में रिप्लाई भी देना पड़ती है । उसमें यह भी नहीं कहा जाता कि यह पोस्ट मैं दस दिन पहले देख चुका हूं “क्योंकि उसको बुरा लग जाएगा”। *अरे भैया बहस करने लगे कोई तो आपसी संबंध तो खराब हो ही जाएंगे* इसलिए उस पोस्ट को झेलना तो पड़ेगा ही। अब एक पोस्ट आई स्वास्थ्य संबंधी, मैंने उसको देखा कि स्वास्थ्य कैसा रहना चाहिए, यह करना चाहिए, वह करना चाहिए *जिस पर मैंने कहा कि भैया पहले अपना मन चंगा रखो अपने परिवार को बांधकर रखो, कुछ सुनो कुछ भूलने की कोशिश करो, कुछ को नजरअंदाज कर दिया करो, भोजन जो भी मिले मिलजुल कर खाया करो, मस्त रहो, हंसो और हंसाने के लिए कुछ जरिए खोजा करो, कोशिश हो किसी का दिल ना दुखे सप्ताह में या दस दिन में एक दिन किसी पार्क में या मंदिर में जाकर पिकनिक (दाल बाटी )का प्रोग्राम किया करो, सच मानो आपका आधा स्वास्थ्य ठीक हो जाएगा*
सच मानो भैया वहां से मेरी पोस्ट पर कोई भी रिप्लाई नहीं आया, मैं इंतज़ार करता रहा, इंतज़ार करता रहा। फिर कुछ दिन बाद मैंने उस पोस्ट को भेजने वाले सज्जन की जानकारी ली कि इनका रहन-सहन क्या है? इनका व्यवहार क्या है ?तो पता चला कि इनकी पूरे मोहल्ले में किसी से नहीं बनती, परिवार में इनके भाई-बंधु इनके साथ नहीं रहते और सबसे अहम बात इनके माता-पिता *अमिताभ बच्चन की बागवान पिक्चर* की तरह कभी इस भाई के यहां तो कभी उस भाई के यहां भटकते फिरते हैं और सोचने वाली बात ये है इन भाई साब की अच्छी खासी कमाई है। अच्छी खासी सर्विस करते हैं पर आत्मीयता, मानवता, भाईचारे की भावना इन से कोसों दूर है। हां एक बात जरूर है कि ये भैया जी ना जाने कितनी तरह की बीमारियों से ग्रस्त हैं। बीपी कभी ऊपर तो कभी नीचे रहता है, तो कभी शुगर ऊपर- नीचे होती है, तो कभी हार्ट की प्रॉब्लम भी होती है। इनकी जेब में हमेशा चार-पांच तरह की दवा की गोलियां बनी रहती हैं। *”ये दूसरों को समझाइश तो देते हैं पर खुद नहीं समझना चाहते और व्हाट्सएप पर कई ग्रुपों में अपने आप को महान साबित करते हुए प्रतिदिन बगैर किसी नागा किए अपनी पोस्टें हम लोगों को पढ़ने के लिए भेजते रहते हैं”*। और हां *आपने गौर किया होगा कोरोना के समय में तो* एक से एक बढ़-चढ़कर व्हाट्सएप पर बगैर डिग्री वाले और डिग्री वाले डॉक्टर, हकीम, वैद्य, नुस्खा वाले हमें देखने को मिले और हिदायत देने वाले और तो और हमारे कवि बंधुओं ने तो रिकॉर्ड ही तोड़ रखा था। कोरोना के गीत, कोराना के लेख-आलेख, ढेरों कविताएं *हर दिन पाँच दस देखने को मिला करती थीं*। उस वक्त तो ऐसा लगता था कि जैसे हमारे साहित्यकार बंधु क्या कोरोना जैसी महामारी का इंतजार कर रहे थे कि इस तरह की बीमारी आ जाए और अपनी भड़ास पूरी हो जाए? *ऑनलाइन कवियों ने तो रिकार्ड ही बना रखा था। कई-कई कवियों के पास तो सौ, दो सौ से ऊपर *ऑनलाइन कविता पाठ के प्रमाण पत्र, प्रशंसा पत्र, प्रशस्ति पत्र हो गए थे वे भी मैन्युअल नहीं वे भी फोन पर ही थे।*
आप इन समूह में,ग्रुपों में पोस्टों को देखकर ना अधिक चिंतित हुआ करें और ना बेचैन हुआ करें।
अरे भैया आप किन-किन पोस्टों को अपने जीवन में उतार पाएंगे, नहीं उतार पाएंगे इसलिए आप तो मेरी मानो *पढ़ो मजे करो और डिलीट करो*। ज्यादा सोच और अफसोस करने की आवश्यकता नहीं। मस्त रहो मस्ती में ,आग लगे व्हाट्सएप में। मन चंगा तो कठौती में गंगा।

आर के तिवारी , सागर

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