काव्य भाषा : बदला नज़ारा – दीपक चाकरे”चक्कर” खण्डवा

बदला नज़ारा

नज़ारा बदला मौसम का,
बदलता हवा का बहाव।
सरसरा रही कही पर,
कही पर लगता ठहराव।।
चाल बदली राही की,,
हुआ हाल से बेहाल।
तिलमिला रहा धूप से,
मासूम सूरत हुई लाल।।
टूटी नदियां की धारा,
कैसे सिसकती पड़ी नाव।
नज़ारा बदला मौसम का,
बदलता हवा का बहाव।।
उदासी छाईं पहाड़ों पर,
गुबार उड़ाते हुए मैदान।
मचल रही तरू शिखाएं,
बिखरी प्रकृति की शान।।
फेरी लगाती हुई बदलियां,
धरा पर धूप कही छाँव।
नज़ारा बदला मौसम का,
बदलता हवा का बहाव।।
उमस होती जी घबराता,
पसीने से सिर चकराता।
पंखा झलते हाथों से,
कुम्हलाता नूर उड़ जाता।।
तन-बदन होता चिपचिपा,
पसीने का रोम-रोम रिसाव।
नज़ारा बदला मौसम का
बदलता हवा का बहाव।।

दीपक चाकरे”चक्कर”
खण्डवा

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