विविध : 21 जून विश्व संगीत दिवस: आइए चले चौराहों पर अपने संगीत के साथ – डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह,सागर

21 जून विश्व संगीत दिवस:
आइए चले चौराहों पर अपने संगीत के साथ

– डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

जिस दिन हम विश्व योग दिवस मनाते हैं ठीक उसी दिन अर्थात् 21 जून को विश्व संगीत दिवस भी मनाया जाता है। संगीत का जीवन में बहुत अधिक महत्व है। आज तो विज्ञान भी इस बात को मान चुका है कि संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में भी कारगर है। यह मरीज को आत्मबल बढ़ाने और बीमारी से जूझने में मदद करता है। अनेक मनोवैज्ञानिक चिकित्सक मनोरोगों का ईलाज़ करने में संगीत का सहारा लेते हैं। यह अवसाद, अल्जाइमर और अनिद्रा जैसी चिकित्सा स्थितियों में मदद कर सकता है। यह हमें फिर से जीवंत बनाने और खुद के साथ-साथ हमारे आसपास के लोगों से जुड़ने में भी मदद करता है।

विश्व संगीत दिवस मनाने की शुरुआत फ्रांस से हुई। साल 1982 में पहली बार विश्व संगीत दिवस मनाया गया। उस समय के फ्रांस के तत्कालीन सांस्कृतिक मंत्री जैक लैंग ने देश के लोगों की संगीत के प्रति दीवानगी को देखते हुए संगीत दिवस मनाने की घोषणा कर दी। इस दिन को ‘फेटे ला म्यूजिक’ कहा गया। फ्रांस में 1982 में जब पहला संगीत दिवस मनाया गया तो इसे 32 से ज्यादा देशों का समर्थन मिला। इस दौरान कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। पूरी राज जश्न मनाया गया। उसके बाद से अब भारत समेत इटली, ग्रीस, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, पेरू, ब्राजील, इक्वाडोर, मैक्सिको, कनाडा, जापान, चीन, मलेशिया और दुनिया के तमाम देश विश्व संगीत दिवस हर साल 21 जून को मनाते हैं। वर्ल्ड म्यूजिक डे के दिन संगीत के क्षेत्र से जुड़े बड़े-बड़े गायकों और संगीतकारों को सम्मान दिया जाता है। ऐसे में दुनिया भर में जगह-जगह पर संगीत से जुड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है जिन्हें संगीतकारों और गायकों को सम्मानित किया जाता है. हर वर्ष इस दिवस की थीम तय की जाती है. इस बार की थीम है “चौराहों पर संगीत” यानी “म्यूजिक एट इंटरसेक्संश”।

शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे संगीत पसंद ना हो. संगीत ऐसी चीज है, जो लोगों के दिल और दिमाग पर गहरा प्रभाव डालती है। इसी वजह से दुनिया भर के गायकों और संगीतकारों को म्यूजिक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मान देने के उद्देश्य से आज (21 जून) विश्व भर में ‘वर्ल्ड म्यूजिक डे’ सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिवस का आयोजन शांति को बढ़ावा देने और संगीत के प्रति लोगों की रुचि बढ़ाने के लिए किया जाता है, क्योंकि म्यूजिक जीवन में शांति और मन को सुख देता है। इसी वजह से ज्यादातर लोग म्यूजिक सुनना पसंद करते हैं. किसी को दुख कम करने के लिए संगीत सुनना अच्छा लगता है, तो कोई खुशी में म्यूजिक सुनने को महत्त्व देता है।

संगीत प्राचीन काल से मनोरंजन के मुख्य स्रोतों में से एक रहा है। प्राचीन काल में राजा महाराजा संगीत सुनते थे वह संगीत सुनकर अपना मनोरंजन करते थे वही आज के इस जमाने में लोग संगीत सुनकर अपना मनोरंजन भी करते हैं और अच्छे से अपना समय बिताते हैं। पहले के समय में, जब कोई टेलीविज़न, इंटरनेट कनेक्शन, वीडियो गेम या किसी अन्य तरीके से अपने आप को मनोरंजन करने के लिए नहीं था, तो संगीत ने लोगों को बोरियत से निपटने में मदद की। इससे उन्हें एक-दूसरे से बेहतर जुड़ने में मदद मिली। लोगों ने लोकगीत गाए और अपनी धुनों पर नृत्य किया। संगीत सीधी हमारी मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालता है। संगीत के कई रंग होते हैं जिसमें गाना, बजाना, सुनना, सुनाना, गुनगुनाना, जो हमारे मस्तिष्क को ऊर्जा देते हैं, जो मस्तिष्क पर काफी प्रभाव छोड़ते हैं और जिससे हम खुशी महसूस करते हैं।

संगीत में प्रकृति को भी प्रभावित करने की क्षमता होती है। यह माना जाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ ऐसी राग-रागिनियां थीं जिनसे आग प्रज्ज्वलित की जा सकती थी अथवा पानी बरसाया जा सकता था। मानव पर ही नहीं पशु, पक्षियों और वनस्पतियों पर भी संगीत का गहरा प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि यदि अच्छा संगीत बजाया जाए तो पौधों की वृद्धि अपेक्षाकृत तेजी से होती है और वे स्वस्थ रहते हैं।

इस दुनिया में संगीत के अनेक प्रकार हैं। लेकिन सबसे प्रमुख और आधारभूत प्रकार हैं- क्लासिकल म्यूजिक और लाईट म्यूजिक। वैसे तो यह विशद विषय है किन्तु अत्यंत संक्षेप में इस पर चर्चा करते हुए पं. शारंगदेव द्वारा ‘‘संगीत रत्नाकर’’ लिखी गई परिभाषा का स्मरण किया जा सकता है कि ‘‘गीत, वाद्य तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते’’ अर्थात गाना, बजाना तथा नृत्य इन तीनो का सम्मिलित रूप संगीत कहलाता है। यद्यपि पश्चिमी देशों में संगीत से आशय केवल गायन और वादन से समझा जाता है। वहां नृत्य को संगीत के अंतर्गत नहीं रखा जाता है। वैसे गायन, वादन और नृत्य को परस्पर एक-दूसरे का पूरक मानना उचित है। भले ही परन्तु इन तीनो विधाओं का स्वतंत्र रूप से भी प्रदर्शन किया जाता है किन्तु गाते -बजाते समय भाव-प्रदर्शन के लिए थोड़ा बहुत हाथ चलाना, गाते समय मुखाकृत बनाना अर्थात शरीर की भाव – भंगिमाए आदि स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस तरह तीनों कलाओं को संगीत के अंर्तगत माना जाना गलत नहीं है।

आजकल इंसान भौतिकवाद की दौड़ में जिस प्रकार बंधी-बंधाई ज़िन्दगी जी रहा है उसमें संगीत की यह ‘‘चौराहों पर संगीत’’ थीम रखा जाना उचित है। विगत कोरोना काल ने समूचे विश्व को जिस तरह घरों में कैद कर दिया था उस दृष्टि से भी ‘‘चौराहों पर संगीत’’ विशेष महत्व रखता है। यूं भी आजकल विश्व में जो आतंक और अपराध का वातावरण व्याप्त है उसमें भी ‘‘चौराहों पर संगीत’’ मानवता को एकजुट होने का संदेश देता है। देखा जाए तो ऐसी थीम और ऐसे दिवसों की सारे विश्व को बहुत जरूरत है जिसमें मनुष्य अपनी मनुष्यता को बचाए रखते हुए परस्पर एक-दूसरे का सहयोगी बने और अपनी शारीरिक मानसिक सेहत का पूरा-पूरा ध्यान रख सके।

सागर (म.प्र.)

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