कहानी : दुविधा – लतिका जाधव , पुणे

दुविधा

– लतिका जाधव

दोपहर के बाद बैंक में सुस्ती छा गई थी। एक छोटे से गांव में सरकारी बैंक की वह छोटी सी शाखा थी, जो लोगों की आम जरूरतें पूरी कर रही थी। पांच बजने वाले थे। सुमन ने अपना सामान समेटा, फिर मैनेजर साहब के पास कुछ फाइल्स लेकर गयी, काम खत्म हो गया था। सुमन बैंक से घर जाने के लिए बस अड्डे की तरफ निकली, आंखों के सामने अब अपना घर नज़र आ रहा था।
वह धूल भरे रास्ते पर गुमसुम सी चलने लगी , जहाँ थोड़ी सी हवा के साथ धूल उड़ने लगती थी।बस अड्डे पहुंची, जहाँ पर सब हमेशा की तरह खुला माहौल था। बैठने के लिए जो सीमेंट की बनी बैंच थी, उस पर गंदगी के धब्बों को देखकर दिल मिचलाने लगता था। लगता था, इनकी सफ़ाई शायद बारिश से ही होती होगी। उसने देखा किसी बुजुर्ग के लिए उनके बेटे ने उस सीमेंट की बैंच पर अख़बार बिछा दिया था, वह बेचारे थके हुए से थे, जो बैठ गए थे। ऐसी हालत में सुमन वहां बस अड्डे की छत के नीचे खड़ी हो गई। वैसे उस माहौल में सभी घुमक्कडों ने बैठने का अपना अपना इंतजाम कर लिया था। कोई पेड़ के नीचे पड़े बड़े पत्थरों पर, कोई चाय कि टपरी की बैंच पर,तो कोई किसी की दुपहिया पर बैठे- बैठे उडती धूल को अपनाकर बस की राह निहार रहे थे।
यह बादलपुर का बस अड्डा था, जहां अभी अभी सुमन तबादले के कारण आ गई थी। इससे पहले पास के बड़े शहर मीरानगर के बैंक में कैशियर थी, लेकिन इस बैंक की जहाँ जहाँ भी शाखाएँ थी, वहाँ हर कर्मचारी को तबादला होने पर जाना पडता था। वैसे भी हाथ लगी नौकरी इस कारण कोई छोड़ थोड़े सकता था। सुमन वैसे भी अपनी नौकरी को अपना लक्ष्य मानती थी, जो नारी सबलीकरण का उसके लिए एक अटूट हिस्सा भी था।वह जय से शादी के लिए इसी बात पर राज़ी हुई थी कि, वह नौकरी नहीं छोड़ेंगी। वैसे भी शादी-ब्याह की दुनिया में नौकरी करनेवाली लड़कियों ने आजकल एक अच्छी जगह बनाई है।
थोड़ी ही देर में बस धूल उड़ाती हुई आ गई, लोगों ने बस की ओर दौड़ना शुरू किया। सुमन के लिए भीड़ मे चढ़ना आसान नहीं था, वह रूक गई, फिर भीड के थमते ही चढने लगी। उसके आगे एक औरत बच्चे को गोद में लिए सामान के साथ थी। सुमन अंदर आते ही जगह देखने लगी, बस के कडंक्टर अब उसको पहचानने लगे थे। रोजाना का उसका सफ़र और बैंक की नौकरी से बनी उसकी पहचान, सबके लिए एक कौतूहल का विषय भी था।कडंक्टर ने अपनी सीट से आगे की सीट पर बैठे लोगों को उठाया, वहाँ सुमन के लिए जगह बना दी। वैसे तो हर बस में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था होती है, लेकिन वह भी उनके लिए मिलना मुश्किल होता है।
बस का सफ़र एक जमाने में सुमन को बहुत अच्छा लगता था। लेकिन अब शादी के बाद उसकी दुनिया बदल गई थी। अब उसको अपना एक – एक पल नौकरी और गृहस्थी के लिए हुनर के साथ इस्तेमाल करना पड़ता था। घर – बाहर सबको खुश करना था, अपने आप को मुस्तैद भी रखना पड़ता था। सुमन के दिमाग में हमेशा सुबह से लेकर रात तक के कामों की एक लंबी फेहरिस्त बनती और बदलती रहती थी। इसलिए घर वापसी की बस जितना जल्दी मीरानगर पहुंचे उसके लिए उतनी ही खुशी कि बात रहती थी।
वैसे मीरानगर उस गांव से बत्तीस किलोमीटर की ही दूरी पर था।जब उसका तबादला बादलपुर में हुआ तब उनके मैनेजर ने आराम से कहा था, “कोई डर की बात नहीं है, केवल आधे घंटे का ही तो सफ़र है।“
लेकिन उनके बातों की असलियत तो सुमन को बाद में पता चली, मैनेजर हमेशा अपनी कार से ही बाहर जाते थे। कार से यहां आते समय तेज रफ़्तार से आधे घंटे में सफ़र तय कर लिया करते थे। सुमन तो सरकारी सेवाओं में विश्वास करती थी। कार लेकर घूमना उसको कभी जरूरी नहीं लगा था। इधर सरकारी बसें उनके नियोजित समय और रफ़्तार से चलती थी।तबादले के बाद एक नये अनुभव से सुमन गुजर रही थी।
सुमन ने देखा सबसे बड़ी मुश्किल बात इस सफ़र की यह थी, हायवे तक पहुंचने के लिए जो रास्ता था, उसकी बहुत ही खस्ता हालत हो गई थी। सडक जगह जगह टूट गई थी, उस टूटी सडक़ पर बने बडे खड्डे गंभीर समस्या हो चुके थे, जिनकी वजह से बस से सफ़र करनेवाले सभी परेशान हो जाते थे। आम आदमी को सरकारी बस का ही सहारा था। सुमन इस स्थिति में यही सोचती थी, हमारे देश में अभी भी आम आदमी छोटी – छोटी सुविधाओं से कितना दूर है, वह इन समस्याओं को देखकर दुखी हो जाती थी। मीरानगर मे रहकर इन बातों का ज्ञान नहीं होता था।शहर के बड़ें माँल, चौड़ी लंबी सडकों से ही देश की तरक़्क़ी नहीं नापी जा सकती थी। इस बात का गंभीरता से उसको अब अहसास होने लगा था।
बस जैसे ही हायवे पर लग जाती थी, दुनिया एकदम से बेहतर हालात में बदल जाती थी। यदि भीड़ ना हो तो मीरानगर आधे घंटे में आ जाता था।
एकदम से अपने इन खयालों मे खोयी सुमन जाग गई, क्योंकि आज अचानक बस हायवे के पहले ही रूक गई। क्योंकि आज कोई ‘हाय सिक्योरिटी’ का मामला था। एक जरूरी काम के लिए सरकारी अफसरों का काफ़िला जा रहा था। इसलिए हायवे आम लोगों के वाहनों के लिए कुछ समय तक बंद कर दिया था। दोनों तरफ़ से ट्रैफिक जाम हो गया था। एक घने पेड़ के पास बस को रोककर ड्राइवर उतरा, सब सवार भी नीचे उतर गये। सुमन ने नीचे उतर कर माँ को फोन पर सब बता दिया। वह अपने बेटे गोपाल को माँ के पास छोड़कर फिर नौकरी पर आती थी। उसके पति जय भी जरूरत के हिसाब से कभी कभी ससुराल में आकर रहते थे।
उसके साथ जो हमसफ़र औरत थी अपने बच्चे को बहला रही थी।वह माँ को परेशान कर रहा था। दोनों ही बहुत थके थके हुए लग रहे थे। करीबन मुश्किल से तीन साल का वह लड़का होगा। सुमन ने अपने बैग से बिस्किट निकालकर उस बच्चे को दिए। उसकी माँ को थोड़ा संकोच सा लगा।
वह बोली, “अरे दीदी रहने दो।“
सुमन ने कहा, “अरे! तो क्या हुआ। बिस्किट कोई बड़ी बात है।इसको देखकर मुझे अपने बेटे की याद आ गई।“
सुमन की बात सुनकर वह औरत मुस्कुराई।
सुमन बच्चे की तरफ देखकर बोली, “नाम बताओ अपना।“
“बबलू” माँ की तरफ देखते हुए बच्चा बोला।
“ तुम्हारा नाम?” सुमन बबलू की माँ को देखकर बोली.
“राधा रानी “ वह भी मुस्कुराई।
सुमन हायवे का ट्रेफिक जाम देखकर समझ गयी, आज समय अपने हाथ में नहीं है। वह उन दोनों को देख रही थी। उसको राधारानी अपने से उम्र में छोटी ही लग रही थी।
पास पड़े पेड़ के लंबे टुकड़े पर सुमन बैठ गयी। बबलू अब वहीं खेलने लगा। सुमन का यह अपनापन दिखाना राधा को अच्छा लगा। उसने अपने बारे में सुमन को बताया। वह मीरानगर की एक बस्ती में रहती हैं।घर में सास है, पति किसी बिल्डर के यहाँ प्लंबर का काम करता है।वह शहर से इस गाँव की छोटी- छोटी दुकानों में जाकर महिलाओं के लिए रोजाना की चीजों को लेकर आती हैं। जैसे कि बिंदी, कुंकुम, चुड़ियाँ, क्रीम, कपड़े और भी जैसी मांग हो, तो कभी घर घर जाकर भी यह चीजें बेचती थी।
सुमन को सब सुनकर आश्चर्य सा लगा।
“रोज आती हैं? कितने पैसे कमा लेती है? “ सुमन बोल उठी।
राधा कहने लगी, “मैं आसपास के गांवो में भी जाती हूँ। महिने भर मे छह से सात हजार मिल जाते हैं।“
सुमन की जिज्ञासा बढ़ रही थी।“अरे वाह! कब से यह काम शुरू किया?”
“वो तो मेरी सासू माँ करती थी, मेरी शादी हो गई। उनके साथ मैं भी जाने लगी, मुझे भी अच्छा लगा, सासू माँ तो अब खाट पर है। मैंने सोचा जबतक कर सकती हूं, करती रहूंगी।“ रानी पूरे आत्मविश्वास से बोल रही थी।
आनंद और आश्चर्य से सुमन का चेहरा झलक उठा।
एक साधारण सी दिखने वाली, मामूली पढ़ाई वाली रानी,एक बच्चे को साथ लिए छोटा कारोबार चलाती है, घर में बीमार सास, कोसों दूर मायका, गांव गांव घूमकर सच्चाई और हिंमत से काम करना, सचमुच हौसला ही तो चाहिए।
वह अपने आप के बारे में सोचने लगी, मैं कितनी हड़बड़ाहट वाली जिंदगी जी रही हूँ। जबकि एक अच्छी नौकरी, समझदार घरवाले, ससुराल – मायके में गोपाल को हरदम आंखों का तारा समझने वाले सब लोग।घर में मेरी पर्वा होती हैं। मैं अपने हक़ों के लिए लड़ती हूँ।यह सब तब होता है, जब शिक्षा और नौकरी हो साथ ऐसा ही मैं मानती थी।
हायवे खुल गया। सब बस में जाकर बैठ गए। ट्रैफिक मे फंसी गाडिय़ों को धीरे धीरे से रास्ता मिलने लगा। सुमन ने रानी को अपने बैंक का पता दिया और आने के लिए कहा। रानी चौंक कर बोली, “दीदी आप यहाँ रोज आती हैं? फिर आपका बेटा कहाँ रहता है?”
“कभी मां के घर, कभी ससुराल वाले देखते हैं. एक आया भी साथ रहती हैं.”सुमन बोली
“सबकी अपनी कहानी है। फिर भी बच्चों के लिए प्यार से देखनेवाले लोग चाहिए। मेरे घर मे कोई नहीं है, इसलिए मैं बबलू को साथ लिए यह काम करती हूँ।लेकिन दीदी काम तो जो हाथ में है, वह नहीं छोड़ सकते है ना हम।” रानी थकान भरी आवाज में बोल रही थी।
दूर शहर रात मे जल उठीं बत्तियों से चमक रहा था।बस्तियाँ जो शहर के पहले ही नजर आ रही थी, वहाँ बस रुक गई। बबलू और सामान को समेटते हुए रानी खडी हो गई, सुमन को देखकर हंसते हुए उतर गई।
सुमन फिर से अपनी दुनिया में लौट आयी। उसकी कालोनी का बस अड्डा आ गया था। चंद कदमों की दूरी पर उसकी माँ का मकान था।आज बहुत देर हो गई थी, गोपाल सो गया होगा। वह मन ही मन अस्वस्थ हो रही थी।
घर की चौखट पर आकर उसने लंबी सांस ली। बेल दबाकर सोचने लगी, मैं कितनी स्वार्थी हूँ। मुझे नौकरी चाहिए, घर – बच्चे और परिवार भी चाहिए। मैं और मेरी यह दुनिया, मैं इससे ही खुश हो जाती हूँ।
नीलेश ने उसके छोटे भाई ने दरवाजा खोला। सुमन का उतरा हुआ चेहरा देखकर वह सहम गया।
“दीदी, आप ठीक तो हो। बहुत थकी थकी लग रही हो।“ नीलेश को दीदी की चिंता हो गई थी।
“थकान ही तो है। मां कहाँ है, गोपाल..” सुमन यकायक अपने उपर बहुत बोझ सा महसूस कर रही थी।
उसने देखा मां बिस्तर पर लेटी थी, गोपाल सो गया था। रात के लगभग दस बज रहे थे।
सुमन को देखकर माँ खुश होकर बोली, “आ गयी, चल कपड़े बदलकर आ,खाना खाते हैं। अरे हां! आज ‘जय जी’ इधर नहीं आयेंगे, उनकी माँ को बुखार चढ़ गया है।कल सुबह हम ही उधर जायेंगे”
सुमन माँ से बोली, “माँ क्या मैं नोकरी छोड़ दूं। मेरे लिए आप सब कितनी तकलीफ़ उठाते है। जय, गोपाल और ससुराल वाले आप सबको मैं क्या दे रही हूँ”
माँ एकदम हैरान होकर बोली, “गोपाल अब अगले साल से स्कूल जाने लगेगा, तबतक थोड़ा बहुत यह चलता रहेगा। मुझे तो कोई तकलीफ़ नहीं है। तुम हमारे सबके लिए एक अभिमान हो। ऐसा नौकरी छोडऩे के बारे में फिर कभी मत सोचना। मैं भी गोपाल के साथ खुश रहती हूँ। अब ससुराल में वह लोग जैसा भी है, जय तो तुम्हारे साथ ही है।तुम देखना यह दिन भी यूँ उड़ते हुए निकल जायेंगे”
माँ की दिलासा देनेवाली बातें सुनकर भी सुमन एक अजीब सी दुविधा मे डूबी थी। मैं सचमुच स्वार्थी हूँ, मेरे कारण माँ, जय और ससुराल वाले कितना त्याग कर रहे हैं। क्या सब महिलाओं को ऐसा प्यार और घरवालों से आधार मिलता है?
सोए हुए गोपाल को उसने दूर से निहारा, वह नींद में मुस्कुरा रहा था।सुमन सोचने लगी क्या गोपाल सपने में मुझे देख रहा है, या नानी के साथ खेल रहा है।
वह खाना खाकर बिस्तर पर लेटी गोपाल को पास में सुलाया, माँ को भी उनके कमरे में छोड़ आयी। नींद आंखों में उतर आयी और थकान के साथ वह नींद मे खो गई।
रात के इस प्रहर मे अब ममता का आंचल, आश्वस्त होकर बच्चे के साथ नींद में खो गया था।

लतिका जाधव, पुणे

3 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर कहानी। बहुत बहुत बधाई लतिका जी।

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