लघुकथा : रक्तदान – गीता चौबे गूँज , राँची

लघुकथा : रक्तदान

महीने भर पहले ही नेहा सुजीत से शादी कर उसके घर में आयी थी। ससुराल में परिवार के नाम पर सुजीत के अपाहिज पिता थे। नेहा खुश थी कि छोटा परिवार है, उसे ज्यादा काम नहीं करना पड़ेगा। लेकिन जब नई-नवेली नेहा का अपाहिज ससुर के कारण घुमना-फिरना नहीं हो पा रहा था तो, झुंझला उठती थी। कभी-कभार बड़बड़ा उठती…
” ‘काम के न काज के, दुश्मन अनाज के!’… पता नहीं ईश्वर ऐसे लोगों को जिंदा ही क्यों रखता है? ”
ससुर जी के कानों में जब-तब ऐसी बातें पड़तीं, परंतु कुछ न कर पाने की विवशता पर मन मसोस कर रह जाते…
“बहू ठीक ही तो कह रही है, काश कभी बहू के काम आ पाता!”
आज दोपहर होने को आयी, पर अभी तक बहू खाना लेकर नहीं आयी तो चिंतित हो उठे। पैर से लाचार! कैसे पता करें?
तभी सुजीत ब्रेड और दूध लेकर पिता के पास आया। उसे देखते ही उन्होंने कहा –
“आज काम से जल्दी कैसे आ गए बेटा? बहू भी सुबह से दिखाई नहीं दी! ”
” पापा! नेहा सुबह में सीढ़ियों से गिर गयी थी। पड़ोस के अंकल ने फोन पर बताया मुझे। मैंने उसे अस्पताल में भर्ती कराया है। उसका सर फट गया है। काफी मात्रा में खून बह जाने के कारण उसकी जान खतरे में है। बी निगेटिव ग्रुप का खून अस्पताल में नहीं है। मैं उसी के लिए पास-पड़ोस से मदद माँगने आया था तो ख्याल आया कि आप भूखे होंगे। ”
” बहू अस्पताल में है और मेरे गले से निवाला उतरेगा? अरे! मेरा ब्लड ग्रुप बी निगेटिव ही है। मुझे अस्पताल ले चल… अपना रक्तदान कर मैं किसी काम तो आ सकूँ! ”

©️®️
गीता चौबे गूँज
राँची झारखंड

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