कथा-कहानी : निर्जला..!! – विनोद सिन्हा “सुदामा” गया जी

निर्जला..!!

सुनो…मैं गई थी उस रोज़ भोले बाबा के मंदिर..थाल में बेलपत्र सजाए..हजारों सीढ़ियाँ ऊपर चढ़कर जल अर्पण कर मांगने तुम्हें ख़ुद निर्जला रहकर.!

#निर्जला” जाने क्या सोच माँ बाबा ने भी मेरा नाम #निर्जला ही रखा था,अक्सर पूछती मैं ये क्या नाम रख दिया आपने मेरा जला वला सा #निर्जला..? माँ बाबा हँस देतें,कहतें भगवान शिवजी का प्रसाद है तेरा नाम.!

#निर्जला एकादशी” -इसी दिन जन्म हुआ था मेरा.! कहते हैं इस व्रत में पानी तक पीना वर्जित रहता है इसलिये इसे निर्जला एकादशी कहते हैं और मेरी माँ जो शिव की परम भक्त थी और ख़ुद व्रत भी धरे थी उस रोज,मेरे इस दिन जन्म लेने पर मेरा नाम #निर्जला रख दिया.! फिर जैसे जैसे बड़ी हुई मुझे मेरे नामकरण का ज्ञान हुआ,और धीरे धीरे अपने नाम से प्रेम भी! यदा कदा माँ बाबा के साथ भ़ोले बाबा का दर्शन भी कर लेती दूर पहाड़ियों पर बसे बाबा के मंदिर जाकर,लेकिन मैं भी भक्त बन गयी थी ऐसा नहीं हुआ था अभी तक पर बाबा की छवि बहुत मनोहरी लगती थी मुझे,कई बार जब माँ शंकर पार्बती की कहानियाँ सुनाती तो मैं माँ से बोलती थी मेरी शादी भी शंकर से ही कर देना..माँ हँस देती.।

और फिर तुम मिले उस पहाड़ी वाले बाबा के मंदिर में जब कॉलेज की छुट्टियाँ बीताने उतराखण्ड गयी और अपनें दोस्तों के साथ केदारनाथ मन्दिर.!

माँ बाबा ने भी कह रखा था हिमालय पर्वत की गोद में स्थित बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित भोले बाबा के इस मंदिर के बारे में.। मैं भी रह न सकी चली आयी जिद्द कर के बाबा के दर्शन हेतु.! पर कहाँ पता था नियति को कुछ और मंजूर है,मुझे तुमसे यहीं मिलना था और मिलकर बिछड़ना भी..ओहहह कुछ पल को ही तो मिले थे हम लेकिन उन कुछ पलों में ही एक दूसरे के कितने करीब आ गए थे,तुम न होते तो शायद दर्शन भी नहीं कर पाती मैं बाबा की,कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था दर्शन के लिए,सोच कर ही मन डर जाता है.!

बीबी जी आप चाहें तो डल्ले में बिठा कांधे पर आपको ऊपर मंदिर ले जा सकता हूँ मैं..?

जाने क्या जादू था तुम्हारे कहे में कि चाहकर भी ना नहीं कर सकी थी तुम्हें,जबकि मेरी सारी सहेलियाँ टट्टुओं पर बैठ आगे ऊपर जाना चाहती थी लेकिन मैं डर रही थी क्योंकि मुझे टट्टू पर चढ़ने में डर लगता था..खैर डरते डरते तुम्हारे साथ हो ली.!

कितने बातूनी थे तुम कितनी प्यारी प्यारी बातें करते या यह हुनर था तुम्हारा सारे रास्ते अपनी बातों में उलझाए रखा,बातों बातों में कब हम ऊपर आ गए पता ही नहीं चला..

इस बीच तुम्हारी आँखें जाने क्या ढूँढ रहीं थी कुछ कहना चाह रही थी शायद पर कह नहीं पा रही थी,तबतक मेरी सहेलियाँ भी आ गयीं और मैं बाबा के दर्शन हेतु उनके साथ मंदिर में चली गई….तुमसे चलने को कहा तो तुम्हारा उत्तर मुझे निरूत्तर करने के लिए काफ़ी था.!

बाबा को बाबा की दर्शन की क्या आवश्यकता.? बाबा तो मेरे रोम रोम में हैं.!

सोचा यहीं रहते हो अक्सर दर्शन हो ही जाते होंगे इसलिए ऐसा कहा.।

लेकिन जब मंदिर के अंदर गयी तो तुम्हारी इक झलक सी दिखी,फिर तुरंत ओझल हो गए आँखों से तुम,जाने क्यूँ ख़ुद को अचंभित होने से नहीं रोक सकी थी मैं उस क्षण,अभी तो आने से मना किया और अभी..?

खैर जब वापस आयी तो तुम नहीं दिखे…दोस्तों ने कहा कोई सवारी मिल गया होगा चला गया होगा उसे लेकर नीचे…पर मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं था..मुझे लगा तुम मुझे लिए बिना नीचे नहीं जा सकते बहुत खोजा बहुत पूछा पर तुम नहीं मिले,अंतोगत्वा हारकर हमसब नीचे आ गए..

कितनी मंदबुद्धि थी मैं..इतनी देर साथ रही पर तुम्हारा नाम तक नहीं पूछा मैंने…वो तो तुम्हारे कदकाठी और रंग का सहारा लेकर वहीं नीचे फूल वालों से पूछ ताछ की तो तुम्हारा नाम #रूद्रा जान पायी सब तुम्हें इसी नाम से जानते थे यहाँ तक तुम्हारा वास्तविक नाम क्या है,या है भी कि नही किसी को नहीं पता, आश्चर्य की बात तो यह कि तुम्हारा पता भी कोई नहीं जानता था यहाँ,तुम कहाँ रहते हो कहाँ से आते हो किसी को मालूम नहीं, बस इतना जान पायी उनसे कि #महाशिवरात्रि के दिन ही तुम पहाड़ पर नज़र आते हो और असहाय लोगों की सेवा सहायता करते हो और मंदिर तक ऊपर पहुंचाते हो..सच कहती हूँ मैं तभी जान भी पायी कि उस रोज #महाशिवरात्रि थी और संयोग से मैने अभी तक जल भी ग्रहण नहीं किया था…अत: बाबा का #निर्जला ही दर्शन हो गया सोच मन थोड़ा प्रसन्न भी हुआ पर तुम्हें लेकर व्यथित भी था.समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ऐसा क्यूँ हो रहा था मेरे साथ.!

फिर एकाएक ध्यान आया तुमने स्वयं ही तो बतलाया था नाम अपना जब ऊपर पहुँच दो पल को सुस्ता लो कहकर कितनी देर बातें करती रही थी तुमसे वहीं सीढ़ियों पर बैठे बैठे,उसी दौरान तुमने ये भी बतलया कि यहाँ सच्चे मन से जो मांगो मिल जाता है.!

मैंने हँसकर पूछा तुमने नहीं मांगा अब तक..तुमने मेरी तरफ देख मुस्कुरा कर कहा- #श्रीकण्ठ को मांगने की जरूरत नहीं पड़ती,मैं तो बस सदा देना जानता हूँ .!

#श्रीकण्ठ-क्या विचित्र सा नाम था तुम्हारा भी मेरी तरह..खैर लाख खोज़बीन पर भी तुम्हारा पता न चला और हम सभी अपने घर लौट आएं..आकर मैने माँ से सारी बात बतायी..माँ हँस रही थी मुझपर..

परंतु दिल में अब भी तुम्हारा ख्याल मुझे परेशान कर रहा था,इधर जब कभी भी माँ बाबा के साथ किसी भी मंदिर जाती तुम्हें ढूँढती..ऐसा लगता तुम मुझे यहीं मिल जाओगे.पर शायद हमारा मिलना मुमकिन न था..देखते देखते कई महीनें बीत गएं और साल का अंतिम महिना दिसंबर आ गया,ठंड अभी भी अपने चरम थी,कॉलेज बंद थे,अत: छुट्टी थी,सोचा क्यूँ न तुमसे पुनः मिलूँ….जानती थी माँ बाबा नहीं मानेंगे इसलिए पहली बार उनसे झूठ कहा कि एक दोस्त की शादी है उतराखण्ड जाना है..ना ना करते करते माँ बाबा मान गएं..

पर यहाँ आकर पता चला कि दिसंबर में मंदिर बंद रहता है,क्योंकि यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है..मन उदास हो गया जानकर..आँखें तुम्हें ही ढूँढ रहीं थी पर तुम कहीं नहीं दिखे,आस पास के लोग से पूछा भी पर कुछ पता नहीं,तभी किसी ने आवाज दी…

बीबीजी ..??

मैंने तुरंत मुड़कर देखा..शायद तुम..?? पर नहीं, ये तुम नहीं थे कोई और था जो मुझसे कह रहा था कि आप कल सुबह उस फूल की दुकान पर आना..एक दुकान की ओर इशारा करते हुए उसने मुझसे कहा.अगर मौसम अच्छा रहा तो मैं प्रत:वंदना के समय पर आपको ऊपर मंदिर तक पहुँचा दूँगा…उस समय मंदिर का द्वार खुलता है.।

दिल ने कहा कि न कह दूँ ,लेकिन मेरा मन कह रहा था कि तुम मुझे यहीं मिलोगे.। मैं मान गयी दूसरे रोज़ सुबह सुबह स्नान कर नीचे उसके बताए फूल की दुकान तक पहुँच गयी,ठंड थी अतः तन पर लाल शॉल ओढ़े थी जो माँ ने आते वक़्त जिद्द कर दे दिया था,शॉल की गरमाहट पाकर मन ही मन माँ को याद किया..लगा माँ पास साथ में ही है,तभी देखा वो नीचे सीढ़ियों से टट्टू लिए मेरी ओर चला आ रहा है पास आकर बोला चलिए बीबीजी…आइए इसपर बैठ जाइए.. अपने टट्टू की ओर इशारा कर बोलने लगा,हालांकि मुझे टट्टू पर बैठने से डर लगता था लेकिन फिर भी जाने कहाँ से हिम्मत आ गयी कि मैं तैयार हो गयी,मैंने नीचे ही फूल वाले से पूजा की थाल भी ले लिये..जिसमें उसने ढेर सारे बेलपत्र भी डाल दिए थे..कहा अगर अच्छे से दर्शन हो जाए तो बाबा पर चढ़ा देना..

वो भी तुम्हारी तरह बातूनी निकला..बात करते करते कब ऊपर पहुँच गयी पता नहीं चला.हाँ इसबार नाम जुरूर पूछ लिया मैंने उसका..

बाबा का सेवक हूँ और नाम #त्रिपुरारी है…बीबीजी

कुछ सोच रास्ते में उससे तुम्हारे बारे में भी पूछा क्या जानते हो #श्रीकण्ठ या #रूद्रा को..

जवाब कुछ तुम्हारी तरह ही दिया उसने..

स्वयं को तो जान ही नहीं सका अबतक किसी और के बारे में क्या कहूँ..हाँ इतना भर जानता हूँ कि #महाशिवरात्रि को जाने कहाँ से आ जाता है फिर कहाँ चला जाता है ये तो भोले बाबा ही जाने.।

आप यहीं रूकिए थोड़ी देर में प्रातः वंदना शुरू होगी तो मंदिर का द्वार खुलेगा आप जल्दी से बाबा का दर्शन कर लेना और हाँ एक और बात बीबीजी..यहाँ सच्चे मन से कुछ भी मांगो तो वह मिल जाता है..अत: जो इच्छा हो मांग लीजिएगा..मैं अभी आता हूँ कहकर जाने लगा. मैं आवाज देती रही..अरे मैं नीचे कैसे जाऊँगी.. सुनो तो पर उसने मेरी एक न सूनी और चला गया..थोड़ा विस्मित भी हुई ,बिल्कुल तुम्हारी तरह ही यह भी सलाह देकर गया मुझे.।

मैं मंदिर की ओर देखने लगी,कब द्वार खुले कि भोले बाबा का दर्शन हो और साथ में तुम्हारा भी,सोचा बाबा से मांग लूँगी तुम्हें ही इसबार..फिर इधर उधर देखने लगी शायद कहीं तुम दिख जाओ..एक विश्वास बार बार कह रहा था कि तुम यहीं मिलोगे..कि तभी शंखध्वनि सुनाई दी शायद द्वार खुल गया था,भीड़ तो थी नहीं अत: मंदिर के अंदर चली गयी..लेकिन मंदिर में भी मन शांत नहीं था.,बेचैनी घेरे खड़ी थी मुझे,,मन यही सोच रहा था कि क्षण भर को सही कहीं दिख जाओ,इक पल को लगा भी कि तुम यहीं हो फिर लगा मेरा भ्रम था शायद ,मैंने जल अर्पण किए बाबा के दर्शन किए और बाहर आ गयी,ये सोच़ कि शायद मन शांत हो कुछ मेरा इसलिए वहीं मंदिरगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ के लिए बनी चौड़ी सीढ़ियों पर बैठ गयी…पर ऐसा संभव नहीं लग रहा था..सहसा मेरी नज़र पूजा की थाल पर गयी और मुझे मेरी गलती का आभास हुआ कि मैने बेलपत्र तो चढाए ही नहीं,देखा तो सारे बेलपत्र थाली में ही पड़े रह गए.। मन अपराध बोध से ग्रसित हो गया,सोचने लगी आखिर ऐसी गलती कैसे हुई और क्यूँ हुई कुछ समझ नही आ रहा था मुझे.। इससे पहले तो कभी नहीं हुआ ऐसा,कई बार माँ बाबा के साथ गई थी शिव मंदर और बेलपत्र चढ़ाया था मैंने ..फिर आज…?

जाने क्या इच्छा हुई उन बचे बेलपत्रों को हांथ म़े लेकर निहारने लगी..

पहले तो लगा मुझे फिर कोई भ्रम हुआ हो..लेकिन जब बेलपत्र को दुबारा देखा तो उसमें #त्रिपुरारी का चेहरा दिखा मुझे जिसने यहाँ तक लाया था ,फिर दूसरा लिया फिर तीसरा सब म़े कभी तुम तो कभी वो दिख रहा था..मैं समझ गयी ये तुम ही थे जो कभी त्रिपुरारी, कभी रू्द्रा तो कभी श्रीकण्ठ के रूप में बेलपत्रों में दिख रहे थे मुझे मेरे प्रश्नों का उत्तर मिल भी गया था क्यूँ मेरे बेलपत्र स्वीकार्य नहीं हुएं,और इसका अभिप्राय भी,क्यूँ इतना बेचैन थी मैं तुम्हारे लिए..और क्यूँ आसान नहीं था मिलना..क्योंकि साधारण नहीं था सह प्रेम मिलना तुम्हारा..और एक हो जाना..…

शायद अब भी कुछ बाकी था लेकिन मैं पाऊँ या न पाऊँ तुम्हें पर मेरे मन ने तुम्हें पा लिया था ..आज़ #निर्जला का जलाभिषेक हो चुका था तुम्हारे प्रेमजल से.।

और उन बेलपत्रों को तुम्हारा प्रेमरूप मानकर वापस आ गयी,पर आज़ भी हर क्षण उन्हें निहारती हूँ उनके नयन पखारती हूँ क्योंकि आज भी ये पहले जैसे ही हैं और अब भी मुर्झाए नहीं हैं.।

और हाँ अब मैं तुम्हारी परम भक्त भी बन गई हूँ.! शायद किसी जन्म में मिल जाओ मुझे मेरे सूखे कण्ठ के अमृत बनकर,मेरे हृदय के अराध्य बनकर.!!

प्रतीक्षा है मुझे उस मिलन की,उस सुखद अनुभव की..विश्वास है मन में कभी तो आएगा वो दिन,कि जी सकूंगी मैं अपने इस प्रतिक्षार्थ प्रेम को..जो बस गया है हृदय में तुम्हारे लिए..!!

तुम्हारी प्रतिक्षार्थ #निर्जला…!!

©️®️विनोद सिन्हा “सुदामा”
गया जी

1 COMMENT

  1. बहुत सुंदर कथा। बहुत बहुत बधाई।

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