समीक्षा : प्रकृति से जुड़ी हुई कविताएं हैं सुश्री संध्या सर्वटे के काव्य संग्रह प्रकृति के रंग में -समीक्षक -डॉ.सुजाता मिश्र,सागर

प्रकृति से जुड़ी हुई कविताएं हैं सुश्री संध्या सर्वटे के काव्य संग्रह प्रकृति के रंग में

समीक्षक -डॉ.सुजाता मिश्र

हमारे जीवन में जितने भी रंग है वो सब प्रकृति से ही मिले हैं…. बचपन में हम लोग कटी पतंग, तेरा कौन सा रंग खेलते थे, और उसमे हम बच्चे दौडकर आस – पास मौजूद फूलों, पौधो को छूते थे, और जब आसमानी नीला ,या स्काई ब्लू कहा जाता था तो आसमान की तरफ उंगली उठा कर इशारा कर देते थे …. मानों हमनें आकाश ही छू लिया हो। यानि वो तमाम रंग जो हमारे – आपके जीवन में मौजूद हैं वो सब प्रकृति से ही प्राप्त हैं। मनुष्य की बुद्धि तो उन रंगो को भी विभाजित करने तक सीमित है, धर्म के नाम पर, स्त्री – पुरुष के नाम पर … लेकिन प्रकृति कोई विभाजन नहीं करती, कोई भेद नहीं करती, वह तो सृष्टि के कल्याण के लिये स्वयं को समर्पित कर देती है।

संध्या सर्वटे जी , जिनके नाम में ही प्रकृति की आहट है…. आपके काव्य संग्रह “प्रकृति के रंग” की सबसे बडी विशेषता मुझे जो लगी वह है इस संग्रह की एक भी कविता निराशावादी नहीं है। आमतौर पर होता यूं हैं कि स्त्रियां जब लिखती हैं तो उसमें उनके मन की पीडाएं – व्यथाएं ज्यादा मुखरता से सामनें आती है किंतु संध्या जी का काव्य संग्रह पूरी तरह प्रकृति केंद्रित है। जिसे पढकर और देखकर लगता है कि अधिकांश सागरवासियों की तरह संध्या जी भी प्रकृति प्रेमी है। प्रकृति से प्रेम करने का सकारात्मक पहलू यह है कि इसमें आपको कभी धोखा नहीं मिलेगा …. जितना ज्यादा प्रेम आप प्रकृति से करोगे उसका दुगुना ही सदैव प्रकृति आपको वापस देगी …. मुझे लगता है कि प्रकृति प्रेम ही प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है। आप प्रकृति को सहेज लीजिये, प्रकृति आपको सहेज लेंगी। यह देखकर खुशी होती है कि 30 कविताओं के इस संग्रह में अधिकांश कविताएं प्रकृति से ही जुडी हुई हैं।
संग्रह की शुरुआत ईशवंदना से है,जिसमे एक भावपूर्ण श्री गणेश वन्दना है और श्री विट्ठल जी की वंदना है। मुझे जो कविता सबसे अच्छी लगी वह यादों पर हैं।कहते है कि लोग बिछड जाते हैं, उनकी यादें रह जाती है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वो अपनी यादों के पिटारे में जीवन और रिश्ते के कटु अनुभवों को ज्यादा स्थान देता है, और सुखद पलो को कम। इसलिये अक्सर होता यूं है कि अतीत की स्मृतियां हमें उदासी से भर देती हैं। लेकिन संध्या जी यादों को भी एक सकारात्मक नज़रिये से देखने का आग्रह करती हैं और कहती है :-
यादें जो दिल को देती हैं ताज़गी ,
यादें जो मन को करती हैं प्रमुदित
यादें जो जीवन को करती हैं सरल सुकून भरा
सुखद यादों को हमेशा साथ रखना।

संध्या जी कहना चाहती हैं कि मन में उन यादों को ज्यादा स्थान देना चाहिये जिन्हें याद करने पर मन ताजगी से भर उठे।कि जब आप पीछे मुडकर जीवन को देखो तो आपको संतुष्टि का एहसास हो, निराशा या हताशा का नहीं। मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण भी है। होता यह है कि जो बाते, जो घटनाएं मन को ज्यादा पीडा देती है, दुख देती हैं वही बाते, वही घटनाएं हमें जीवन के बडे सबक भी सिखाती हैं, तो हमारा ध्यान सबक पर होना चाहिये , न कि उन घटनाओ पर , यदि सबक नहीं सीखेंगे तो वही – वही घटानाएं बार – बार होती रहेंगी। इसलिये हमें सबक पर ध्यान देना चाहिये, और जीवन में ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक अनुभवों और सकारात्मक यादों को ही स्थान देना चाहिये।

एक कविता आपने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी पर भी लिखी है , जो कि तिलक जी महत्वपूर्ण कार्यों और उनके योगदानों का काव्यात्मक ब्यौरा है। यह एक ऐसी कविता है कि जिसे स्कूली विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है। कल्प्ना चावला और सर गौर की स्मृति में भी आपने एक कविता लिखी है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो एक बेहतरीन काव्य संग्रह है, जिसमें मन की निश्छ्ल भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति है …. सादगी में भी कयामत की अदा होती है…. मुझे लगता है कि सिम्पल होना सबसे कठिन है इन दिनों …. लोग आत्म महिमा मंडन से बच नहीं पाते …. लेकिन संध्या जी के इस काव्य संग्रह में आपकों उन पर या उनके जीवन पर कोई कविता नहीं मिलेगी …. किसी विशेष विचारधारा के प्रति उनका विशेष झुकाव भी नहीं मिलेगा …. आपको इसमे सिर्फ और सिर्फ कविता मिलेगी ….. एक कमी जो इस पुस्तक में मुझे लगी वह यह कि पुस्तक का आई एस बी एन नंबर नहीं है,तो यदि हम कोई पुस्तक लिखें और इतना सब आयोजन भी करें तो कोशिश करें कि पुस्तक का आई एस बी एन नंबर भी ले लें! ताकि पुस्तक को हम आगे कहीं प्रेषित कर सकें, कहीं संदर्भ आदि में इसका प्रयोग ले सकें।पुस्तक प्रकाशन के लिए संध्या जी को हार्दिक बधाई !…..

डॉ. सुजाता मिश्र
सागर

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