पत्र संपादक के नाम : एक टुकड़ा आसमान : नायक का चरित्र संतुलित है – विनोद कुशवाहा

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  एक टुकड़ा आसमान : नायक का चरित्र संतुलित है

महोदय ,

   विगत् दिनों “अखिल भारतीय साहित्य परिषद” के त-त्वाधान में ‘साहित्य विमर्श’ के अंतर्गत् “एक टुकड़ा आसमान” उपन्यास को समीक्षकों ने अपने-अपने नजरिये से देखा और उसकी व्याख्या की । एक अच्छी बात ये रही कि कार्यक्रम अध्यक्ष कथाकार दिनेश भट्ट सहित विशिष्ट अतिथि ‘कथाचक्र’ के संपादक अखिलेश शुक्ल ने स्वीकार किया कि उन्होंने अभी उपन्यास पढ़ा नहीं है । जबकि एक वक्ता ने तो उपन्यास का अंत बताकर उपन्यास के प्रति पाठकों की जिज्ञासा ही खत्म कर दी । खैर । हालांकि इस साहित्यिक विमर्श में कुछ बिंदुओं को प्रमुख रूप से रेखांकित किया गया । मगर अखबारों को जारी किए गए समाचार में जिस तरह से कार्यक्रम का विवरण प्रकाशनार्थ दिया गया उससे उपन्यास की लोकप्रियता एवं महत्व पर असर पढ़ना स्वभाविक है । इतना ही नहीं इससे न केवल उपन्यासकार के स्वाभिमान को ठेस पहुंची बल्कि उसके लिखे हुए पर भी इसका असर पड़ेगा । एक दैनिक समाचार पत्र ने तो “नायक का चरित्र संतुलित नहीं” की ही हेडिंग बना दी । ये एक तरह से निजी आक्षेप है । वैसे भी जिसकी जितनी समझ होती है वह उस हिसाब से किसी भी समाचार को रंग देता है । साहित्यिक विमर्श में आगे जहां एक ओर किसी वक्ता ने नायक को पलायनवादी बताया तो दूसरी ओर किसी ने उसके तथाकथित प्रेम को मौत के स्वयंवर की संज्ञा दे डाली । नायक के पलायनवादी होने का खंडन करते हुए कार्यक्रम के सूत्रधार वरिष्ठ साहित्यकार बी के पटेल ने कहा कि ‘ नायक का जीवन सकारात्मकता का संदेश देता है ।’ जहां तक नायक के प्रेम को मौत के स्वयंवर की संज्ञा देने का प्रश्न है  इसमें ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि नायक के जीवन में आई तमाम नायिकाओं के बावजूद ये कहीं साबित नहीं होता कि इन नायिकाओं से वह भी प्रेम करता है , न ही उनसे नायक की अंतरंगता कहीं साबित होती है । वे तो उसकी मित्रता के भी दायरे में भी नहीं आतीं क्योंकि नायक के लिये मित्रता के अपने अलग मापदंड हैं । हां इतना जरूर है कि आप इसे नायिकाओं की तरफ से किया गया एकतरफा प्रेम अथवा स्नेह कह सकते हैं जबकि नायक तो उनमें अपनी माँ को खोज रहा होता है । एक समीक्षक ने कहा कि ये हड़बड़ी में लिखा गया उपन्यास है । असलियत ये है कि मुझे इसे लिखने में लगभग चार साल लग गए और ये चार वर्ष मैंने घर से दूर रहकर एकांतवास में बिताए । जहां मैंने लिखने और सिर्फ लिखने का काम किया । एक वक्ता ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है जैसे नायक और कुछ नहीं बल्कि मोक्ष की तलाश में है । हालांकि उपन्यास में स्पष्ट उल्लेख है कि नायक अपने जीवन में आई हुई नायिकाओं में माँ को खोज रहा होता है । उस माँ को जो उसके जीवन का केंद्र बिंदु थीं और जिनकी एक हादसे में दुखद मृत्यु हो गई । मोक्ष की तो नायक को कभी कामना ही नहीं रही । वह तो प्रकृति से प्रेम के चलते बार-बार इस संसार में आना चाहता है ।  खैर । स्पष्टीकरण देने को तो बहुत कुछ है पर फिर कभी ।  पहले आप उपन्यास पढ़ें और तब लेखक के प्रति अपनी राय कायम करें । मैं शुक्रगुजार हूं बी के पटेल , डॉ आर एस मेहरा , डॉ श्रीराम निवारिया , दिनेश भट्ट , अखिलेश शुक्ल , सर्जना चतुर्वेदी , रामकिशोर नाविक , राजकुमार दुबे , सुधांशु मिश्र , मिलिन्द रोंघे , भगवानदास बेधड़क , राजेश दुबे , ब्रजमोहन सोलंकी , पंकज पटेल , रूपेंद्र सोलंकी , आरती शर्मा , मोहम्मद आफाक़ का जिनके सहयोग के बिना इतने गरिमामय कार्यक्रम का आयोजन सम्भव ही नहीं था । हां इतना अवश्य है कि कार्यक्रम में डॉ कश्मीर उप्पल , दिनेश द्विवेदी , पंकज पटेरिया , देवेन्द्र सोनी , विपिन पवार की अनुपस्थिति खलती रही । ज्ञातव्य है कि सर्वश्री पंकज पटेरिया , देवेन्द्र सोनी , विपिन पवार आदि ने इस उपन्यास की सार्थक समीक्षा की है । कुल मिलाकर “अखिल भारतीय साहित्य परिषद” द्वारा आयोजित ‘साहित्य विमर्श’ का यह कार्यक्रम बेहद सफल रहा ।उल्लेखनीय है कि एक समय “पाठक मंच” के माध्यम से नगर में प्रति सप्ताह रविवार को ‘साहित्य विमर्श’ का आयोजन होता था जिसमें डॉ कश्मीर उप्पल , सी बी कब्जा , दिनेश द्विवेदी , आर एम खान ( बाबा भाई ) , हिमांशु मिश्र , अनिल झा की महत्वपूर्ण सहभागिता रहती थी । बाद में “मानसरोवर साहित्य समिति” ने कुछ समय तक इस सिलसिले को कायम रखा । आगे चलकर डॉ श्रीराम निवारिया ने ‘पाठक मंच’ की गतिविधियों को नए आयाम दिए । इस पर से याद आया कि डॉ कश्मीर उप्पल , दिनेश द्विवेदी , आर एम खान ( बाबा भाई ) , हिमांशु मिश्र आदि ने “बातचीत” संस्था के द्वारा  साहित्य , कला , रंगमंच से जुड़ी ए के हंगल जैसी कितनी ही प्रतिभाओं को इटारसी से रूबरू कराया । इसी क्रम में ‘दस्तक’ संस्था ने भी अनेक अभूतपूर्व आयोजन किये जिसमें इंदुमति केलकर जैसी शख्सियत शामिल हुईं । फिर कुछ अंतराल के पश्चात “विपिन जोशी साहित्य परिषद” ने इटारसी में अशोक वाजपेयी , डॉ विजयबहादुर सिंह , डॉ कमला प्रसाद , डॉ भगवत रावत , डॉ पूर्णचन्द्र रथ , डॉ विनय दुबे , कमला मौसी को आमंत्रित कर एक नया इतिहास रच दिया । इस सबकी पुनरावृत्ति किसी भी स्थिति में अब सम्भव नहीं ।

  – विनोद कुशवाहा
एल आई जी / 85
प्रियदर्शिनी कॉलोनी
इटारसी .
 96445 43026

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