समीक्षा : किरदारों के साथ न्याय की नाकाम कोशिश  करता उपन्यास है – एक टुकड़ा आसमान – देवेन्द्र सोनी

समीक्षा :
किरदारों के साथ न्याय की नाकाम कोशिश  करता उपन्यास है – एक टुकड़ा आसमान

उपन्यास – एक टुकड़ा उपन्यास
लेखक – विनोद कुशवाहा
प्रकाशक – शिवना प्रकाशन , सीहोर
मूल्य – 250
समीक्षक – देवेन्द्र सोनी

         अलौकिक प्रेम की तलाश और लौकिक प्रेम के भंवर में उलझे , डरे-सहमे व्यक्ति की कहानी और  किरदारों के साथ न्याय की नाकाम कोशिश करता उपन्यास है – ‘एक टुकड़ा आसमान’ ।
जहां तक मुझे जानकारी है विनोद कुशवाहा  इटारसी के एकमात्र उपन्यासकार हैं और यह उनका पहला उपन्यास है।

           यदि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जासूसी उपन्यासों को छोड़ दें तो उपन्यास के प्रति आम पाठकों की यह धारणा होती है कि वह लेखक के जीवन के इर्द-गिर्द बुना ताना-बाना है या उससे संबंधित घटनाओं के संस्मरण मात्र हैं जबकि ऐसा है नहीं !

           … तो फिर है क्या उपन्यास ?

          कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी के शब्दों में कहा जाए तो – ‘मैं (प्रेमचंद जी) उपन्यास को मानव चरित्र का चित्र मात्र समझता हूं । मानव चरित्र पर प्रकाश डालना तथा उसके चरित्र को स्पष्ट करना ही उपन्यास का मूल तत्व है ।’

           … यहां मानव चरित्र का यह आशय कदापि नहीं है कि वह चरित्र लेखक का  हो ।

          हाल ही में “शिवना प्रकाशन” से प्रकाशित उपन्यासकार विनोद कुशवाहा का उपन्यास “एक टुकड़ा आसमान” जब मैंने पढ़ा तो मुझे मुंशी प्रेमचंद जी की परिभाषा पूर्णतः सही लगी ।

          प्रकाशित उपन्यास “एक टुकड़ा आसमान” में भी मानवीय गुण – दोषों का विश्लेषण और उनके चरित्र का अत्यंत गहन विवेचन किया गया है यह लेखक की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक भी है ।

          मुझे लगता है – अलौकिक प्रेम की तलाश और लौकिक प्रेम के भंवर में उलझे , डरे-सहमे मानवीय गुण – दोषों से युक्त किरदारों की कहानी है यह ।

        उपन्यास की परिभाषा यदि देखें तो – उपन्यास शब्द ‘उप’ – उपसर्ग और न्यास के योग से बना है, जिसका अर्थ है वह कृति जिसको पढ़ कर अधिकतर पाठकों को ऐसा लगे कि वह उसी की कहानी है । उसी के जीवन की कथा उसीकी भाषा में कही गई है । “एक टुकड़ा आसमान” पढ़कर भी यही प्रतीत होता है ।

           उपन्यास पर चर्चा करूं इससे पहले पाठकों के लिए आवश्यक है कि वे लेखक के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में भी जानें – समझें ।

          युवा अवस्था से ही विभिन्न विधाओं में पारंगत उपन्यासकार विनोद कुशवाहा एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी के रूप में मध्य प्रदेश शासन के विभिन्न विभागों में पदस्थ रहे हैं। उनकी प्रशासनिक दक्षता ने जहां उन्हें अपने मातहतों एवं हितग्राहियों में लोकप्रिय बनाया वहीं उच्चाधिकारी भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहे । अलावा इसके  इतनी व्यस्तता में भी उन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से सामंजस्य बैठाते हुए साहित्य का दामन नहीं छोड़ा ।

          वे राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में जहां अनवरत् लेखन करते रहे वहीं नई प्रतिभाओं को भी निरंतर आगे लाने के लिए मंच देते हुए उन्हें प्रोत्साहित करते रहे हैं ।

          इटारसी से नियमित रूप से निकलने वाली अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिकाओं “मानसरोवर” और “अनाहत”  के संपादक विनोद कुशवाहा की सृजन यात्रा काफी लंबी है – उमड़ते मेघ पीड़ाओं के , तलाश खत्म नहीं होगी , तिलिस्म : सपनों की खिड़की का , उनके प्रकाशित काव्य संग्रह हैं । उनके छाया चित्रों पर आधारित पुस्तक ‘मेरे चित्र : मेरे मित्र’ का प्रकाशन हुआ है । ‘पुनश्च’ की अनुषंग पत्रिका ‘शिनाख्त’ द्वारा भी उनके सृजन पर केन्द्रित अंक का प्रकाशन हुआ । साहित्यिक पत्रिका ‘शब्द ध्वज’ ने भी उनकी कविताओं पर केन्द्रित अंक प्रकाशित किया है । विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र , आई सेक्ट विश्वविद्यालय, भोपाल ( म. प्र. ) तथा डॉ सी वी रमन विश्वविद्यालय, बिलासपुर ( छत्तीसगढ़ ) द्वारा प्रकाशित अविभाजित मध्यप्रदेश के कथाकारों पर केन्द्रित वृहद कथाकोश ‘कथा मध्यप्रदेश’ में विशेष रूप से उन्हें सम्मिलित् किया गया । हंस , वागर्थ , नया ज्ञानोदय , कथादेश , संवेद , कथाक्रम , समरलोक आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में समय-समय पर उनकी वैचारिक प्रतिक्रियाओं का प्रकाशन हुआ है । इंडिया टुडे , कादम्बिनी , धर्मयुग , मुक्ता , माधुरी आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में भी वे प्रकाशित हुए हैं । रूस से उनकी कविताओं का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है ।

        ‘पत्रिका’ कार्यक्रम के अंतर्गत् मध्य प्रदेश एवं छत्तीस गढ़ के समस्त आकाशवाणी केन्द्रों से उनकी रचनाओं का प्रसारण हुआ है ।

      सतत् साहित्यिक सक्रियता के साथ ही वे कुशल प्रशासनिक अधिकारी भी रहे हैं । …तो स्वाभाविक ही है – उनके कार्यक्षेत्र में अनेक ऐसे व्यक्ति भी आए जिनकी जीवन शैली / चरित्र ने उन्हें प्रभावित किया । मुझे लगता है कि उपन्यास “एक टुकड़ा आसमान” के पात्र भी इन्हीं में से हो सकते हैं ।
अब इन पात्रों के साथ लेखक से कितना न्याय हो पाया है या पात्रों ने नायक विराग को कितना समझा या विराग उन्हें कितना समझ पाया ? यह तो पाठक या पात्र ही तय करें तो बेहतर होगा । क्योंकि उपन्यास पढ़ते – पढ़ते पाठक भी सभी पात्रों की जीवन शैली ,चरित्र से परिचित तो हो ही जाते हैं ।

        “एक टुकड़ा आसमान” उपन्यास , नायक विराग के जीवन , परिस्थिति और परिवेश के इर्द-गिर्द घूमता है । यहां प्यार है ,चाहत है , आशा है , निराशा है , विश्वास है तो छलावा भी है । अवसाद है तो जीने की तरंग भी है । परिवार है तो बाहर समाज की दुनिया भी है । संघर्ष है तो सुकून भी है । प्रकृति से जुड़ाव और उससे प्रभावित मनोदशा का वर्णन है तो उसे आत्मसात करने या उबरने के यत्न भी हैं , जो किसी चलचित्र की तरह पाठकों के जेहन में समाते हैं ।

          उपन्यास का नायक विराग बचपन से ही विषम परिस्थितियों का सामना करता है । एक-एक कर अपने परिवार के सदस्यों को खो चुके विराग के सर से जब माता – पिता का साया भी उठ जाता है तो वह पूरी तरह से टूट जाता है जिसके चलते वह अत्यंत संवेदन शील , भावुक तथा दुखों के भंवर में डूबते – उतराते निराशा और अवसाद के लक्षणों से स्वयं को ग्रसित महसूस करता है । बावजूद इसके वह हार नही मानता है । निरन्तर संघर्ष से स्वयं को स्थापित करता है और दूसरों के दुख दर्द को अपना दुख – दर्द समझ कर उनसे जुड़ता जाता है । फिर उनसे मिले जरा से भी स्नेह , अपनत्व में वह आत्मीयता को खोजने की नाकाम कोशिश करता है किंतु नायक की यह चाहत जीवन पर्यंत चकोर की चाहत ही बनी रहती है । अंततः उसकी तलाश कभी खत्म नहीं होती । … और नायक की तलाश कभी मुकम्मल नहीं हो पाती । नायक को पता नहीं क्यों हमेशा यूं महसूस होता है कि वह छला जा रहा है । धोखा – फरेब , छल – कपट का भय उसको हमेशा बना रहता है । दुर्भाग्य से उसके साथ होता भी यही है ।

          उपन्यास में विराग का जीवन अनेक किरदारों के सान्निध्य / सामीप्य से प्रभावित हुआ है। अक्सर यह होता भी है जो कई बार भ्रांतियों का कारण बनता है । ये भ्रांतियां पाठकों के मन में भी कही-अनकही अवधारणा बनाती प्रतीत होती हैं ।

        इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि यहां लेखक के वक्तव्य को भी देखा जाए । वे कहते हैं – ” मेरे नवीनतम उपन्यास ‘एक टुकड़ा आसमान’  पर अपना पक्ष प्रस्तुत करने की अभिलाषा रखता हूं । उपन्यास का नायक विराग मात्र शासकीय सेवा में नहीं है बल्कि इससे कहीं बढ़कर वह एक लेखक है । इसे यूं कहा जाए कि मन से तो नायक लेखक ही है।  उपन्यास के कुछ सम्माननीय स्त्री पात्रों को महिला मित्र की तरह समझना उचित नही होगा । उपन्यास में एक या दो ही स्त्री पात्र ऐसे हैं जिन्हें मित्रता की श्रेणी में रखा जा सकता है। एक तरह से तो उनका किरदार मित्रता से भी कहीं ऊपर है । फिर भी उक्त स्त्री पात्रों को मित्रता के ढांचे में जबरदस्ती फिट करना ठीक नहीं होगा । इन किरदारों में कुछ नायक के सहकर्मी हैं तो कुछ परिचित भी हैं जिनका नायक बेहद सम्मान करता है । उसके संपर्क में आने वाले स्त्री पात्र सिर्फ उसके मित्र नहीं हैं । उपन्यास के किरदारों में केवल यहां आकर ‘एक टुकड़ा आसमान’ के किरदार महत्वपूर्ण हो जाते हैं । नायक की नजर से देखें तो वे स्वजन हो जाते हैं । हां, एक बात और नायक की ओर से इन स्त्री पात्रों तथा उसके बीच प्रेम कहीं नहीं है। रह जाता है तो केवल स्नेह आत्मीयता और अपनत्व । चूंकि इन किरदारों में नायक अपनी माँ को देखता है तो जाहिर है कि उनसे उसके भावनात्मक सम्बन्ध बन जाते हैं । यही वजह है कि इन स्त्री पात्रों से उसके भावनात्मक संबंधों के बीच उनका विवाहित होना या अविवाहित रहना आड़े नहीं आता । यदि वे माँ की तरह नायक की पसन्द या नापसंद का ख्याल रखते हैं अथवा उसकी फिक्र करते हैं तो इधर नायक भी तो उनकी भावनाओं का उतना ही सम्मान करता है । साथ ही वह इन किरदारों व उनके परिवार की अस्मिता के प्रति भी बेहद सतर्क रहता है । यहां अतिरेक जैसा कुछ नहीं है । बस नायक के व्यक्तित्व में ही कुछ ऐसा है जिसके कारण ये स्त्री पात्र उसकी ओर आकर्षित होते हैं । उसकी परिस्थितियों के चलते भी इन किरदारों का नायक की तरफ झुकना स्वभाविक है । उल्लेखनीय है कि कुछ स्त्री पात्रों का ही नाम ‘अ’ से शुरू होता है । शेष तो अलग – अलग नामों के किरदार हैं यथा नित्या, मनीषा, जसमीत, ज्योतिका, मुक्ता, नीरा, रूमा, निम्मी । फिर आप ये क्यों भूल जाते हैं कि नायक के मित्र भी तो उपन्यास में मौजूद हैं । वे भी उसकी उतनी ही चिंता करते हैं। फिक्र करते हैं । इनमें प्रमुख हैं शोभित, दिवाकर, अजय, राजीव, विपुल, अविनाश ।”

    इस उपन्यास की साहित्य जगत में निरंतर चर्चा की जा रही है। सबकी अपनी – अपनी दृष्टि होती है। यही कारण है कि अपने – अपने नजरिये से आलोचना /समालोचना होती है ।

          उपन्यास पढ़ते समय पाठक भी विराग की ही तरह उलझती मनःस्थिति का शिकार होने लगता है । कभी वह ‘प्रेम’ की प्रबलता महसूस करता है तो कभी लगता है – यह, वह ‘प्रेम’ नहीं जिसकी चाहत विराग के जेहन में बसी हुई है । अनादि और विराग का तथाकथित ‘प्रेम’ भी इसी असमंजस और अविश्वसनीयता की श्रेणी से गुजरते हुए अपना अर्थ खो देता है । दोनों की स्थिति वैसे ही लगती है जैसे दो नावों में पैर रखता एक व्यक्ति ।

         इसी तरह विराग के जीवन में आए अन्य पात्र भी कमोवेश विराग के स्वयं के प्रति असुरक्षा के भाव, प्रेम के प्रति असुरक्षा के भाव, बनते – बिगड़ते मौसम का विपरीत प्रभाव, चाहत की अति आकांक्षा और रिश्तों में पल-पल पनपता संदेह , सामंजस्य तथा अलगाव के प्रयासों से प्रभावित हुए हैं ।

         … लेकिन मुझे लगता है काल्पनिक लेखन की यही विशेषता पाठक को चाहे गए निष्कर्ष से परे रखते हुए उपन्यास से जोड़े रखती है । उसकी जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है यह जानने के लिए कि आखिर विराग का या उससे जुड़े पात्रों के भविष्य का होगा क्या ?
क्या विराग अवसाद से बाहर आएगा ?
क्या वह अपने मनोनुकूल प्रेम को पा सकेगा ?
या इसका अंत कुछ और होगा ?

  कुल मिलाकर  पाठक पूरे समय उहापोह की स्थिति में  रहता है  और अंत तक पहुंचते-पहुंचते हैरत में पड़ जाता है।   
आखिर क्या हुआ होगा …?
यह जानने के लिए पाठकों को  ‘एक टुकड़ा आसमान’ पढ़ना होगा तभी रहस्य से पर्दा उठ सकेगा !

         इतना कह सकता हूँ कि लेखक ने इस उपन्यास का समापन जिस तरह किया वह निराशाजनक होते हुए भी यह सीख तो दे ही जाता है कि –  व्यक्ति को कभी भी यथार्थ से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए क्योंकि अति विश्वास या बेइंतहां चाहत, चाहे वह किसी भी रुप में,किसी से भी हो, घातक ही होती है ।

         विश्वास दिलाता हूं कि उपन्यास में लेखक ने निरंतर रोचकता और जिज्ञासा बनाए रखने के लिए अपनी भाषा शैली का जो माधुर्य बिखेरा है उससे पाठक बंधे रहेंगे ।

                – देवेन्द्र सोनी
                प्रधान संपादक
                  युवा प्रवर्तक 
                     इटारसी .
               9111460478

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