सरोकार : हरिया जाणे रुखड़ा, उस पानी का नेह सूखा काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेह -इंजी. भारत भूषण आर गाँधी,इटारसी

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हरिया जाणे रुखड़ा, उस पानी का नेह
सूखा काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेह

संत कबीर के दोहों में से एक दोहा कितना सुन्दर सन्देश देता है उसे समझने की सभी को जरुरत है. कबीर कहते हैं कि जो हरा भरा पेड़ है उसे पानी की जरुरत होने का अनुभव होता है जो सूखी लकड़ी हो गया उसे क्या पता कि मेघ कब बरस गए.
ये बात पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से कितनी तार्किक है. हम मानव इस धरती पर जब तक जीवन भर जल का भरपूर इस्तेमाल करते हैं. लेकिन हमारे अहसास तो सूखी लकड़ी के समान हो गए हैं जो जल के प्रति हमारी संवेदनहीनता को दर्शाने लगे हैं.
हम हमारी बात करें तो हम इसके उतने दोषी नहीं हैं जितना कि हमारा सिस्टम हो गया है. हम सामान्य नागरिकों का काम अपनी कमाई में से विभिन्न करों के भुगतान के बदले में सिस्टम से सुविधा लेने का होता है. ये बात और है हम में से कितने लोग करों का भुगतान करते हैं. हालाँकि बतौर उपभोक्ता जिस जिस प्रकार के कर अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से दे रहे हैं वो कोई कम भी नहीं है. उन्हीं दिए गए करों के बदले सिस्टम को नागरिकों को सुविधाएँ देना दायित्व है.
सिस्टम अपनी ढपली को जिस प्रकार से आजकल बजा रहा है उससे एक छोटा सा सवाल तो बनता ही है कि क्या हम नागरिकों को हमारा सिस्टम आज़ादी के 75 साल बाद भी पीने का साफ़ पानी मुहैया करवा पाया है? इसके उलटे आज हमें साफ़ पानी मिलना तो दूर अब अनाज और दलहन भी कैंसर जैसे भयंकर रोग सहित अनेक रोगों को देने वाला मिल रहा है.
एक और बड़ा प्रचलित दोहा है
निंदक नियरे रखिये आंगन कुटी छबाए
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाए

लेकिन मजाल है आज के इस दौर में हम किसी की निंदा कर पाएं. हम उनसे भी आज खतरे में हैं जो अपने आप को सहिष्णु बता कर असहिष्णुता को लगातार बढ़ाने में लगे हुए हैं.
फिर भी हम आप सभी सहिष्णु और प्रकृति के प्रति संवेदनशील की बहुत जरुरत है. हम अपने आप को हरा भरा रखने की कोशिश में अगर आसपास को भी हरा रख पते हैं तो हम कह सकते हैं कि हम जीवित है, वर्ना सूखी काठ है जिसमें अब कोई संवेदना नहीं रही.

इंजी. भारत भूषण आर गाँधी
स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता

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